एक वो होली होती थी गली के आशिकों वाली

  आजकल की होली भी कोई होली है, एक होली मिलन का गेट टूगेदर होता है , टीका लगाया जाता  है, डीजे वाले बाबू गाना बजाते हैं ” मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार , गटका ले ज़रा अल्कोहल से” और सब अंग्रेजी में “Happy Holi” कह कर happy हो जाते हैं।  ये भी कोई […]

तो आखिर ग़ालिब छूट ही गयी शराब ………….रविन्द्र कालिया (1939–2016)

कुछ दिन पहले सत्यानन्द निरुपम के फेसबुक वाल पर रात के एक बजे पढ़ा कि कालिया जी की अस्वस्थता की खबर चिंताजनक है.उस रात सोते हुए मैंने एक छोटी प्रार्थना उनके स्वाथ्य के लिये की.याद आया पटना में हुई उनसे छोटी मुलाकात और उनके मजाकिया अंदाज़.परसों शाम पता चला वो प्रार्थना खारिज़ हो गयी और […]