लौट कर आना तुम

लौट कर आना तुमजब पत्तों के झड़ने का मौसम आयेखटखटाते बंद खिड़कियों के पालेलौट कर आना तुमजब सवेरे की सर्द हवालाये मुट्ठी मे बंद करतुम्हारा यूँ ज़रा सा मुस्कुरानालौट कर आना तुमजब वक्त भाग कर करे पीछाबारिश छुपाये बादलों कोलौट कर आना तुमचिट्ठियों के मौसम मेनंगे पैर ओस पर चलने कोलौट कर आना तुमयूँ कभी […]

एक बंद खिड़की जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं

एक बंद खिड़की जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं खटखटाती हूँ पुरानी लकड़ी के पाले बाहर की तेज़ बारिश के शोर में गुम हो जाती है ये आवाजें कुछ खटखटाहट थोड़ी सिसकियाँ बंद किवाड़ों के पीछे सीलन भरी दीवारों से लगे बैठी है कोई पुरानी कहानी एक वक़्त के किस्से पुराने पर्दों से टंगे पड़े […]

बैंगनी फूल

“क्या बकवास खाना है यार, इसे खायेगा कोई कैसे” विशाल ने टिफ़िन खोलते ही कहा. “ अगर ४ दिन और ये “खाना खाना पड़ा तो मुझसे न हो रही इंजीनियरिंग, मैं जा रहा वापस अपनी पंडिताइन के पास.” “सुन हीरो, बाज़ार से लगी गली के आखिरी में एक पीला मकान है, एक आंटी खाना खिलाती […]

SAKSHAAT 7.0: नाम तो सुना ही होगा ..मिलिये द लल्लनटॉप की टीम से

  जेठ की तपती दुपहरी में मैं नोयडा फिल्म सिटी पहुँचती हूँ, लल्लनटॉप के ऑफिस. एक खुशनुमा सा इनफॉर्मल सा ऑफिस जिसमें बीच बीच में “अरे ये पीस ठीक है क्या” के साथ ठहाकों की आवाज़ सुनाई देती है. लल्लनटॉप के सरपंच सौरभ से बातचीत शुरू होती है और बीच में कोई आकर पूछता है […]