हम पागलों के बीच वो नंगी, अधमरी औरत नहीं रह सकती

कॉलेज से घर जा रही थी, इंटर्नशिप के समय, जब रास्ते में मुझे वो दिखी. आज भी उसके बिखरे हुए बाल, शरीर पर मांस की एक पतली लेयर और उसके चिथड़ों से कपड़े याद हैं मुझे. किसी ने दया खा कर एक शर्ट और कुछ पेटीकोट सा पहना दिया था उसे, हाईवे पर चल रही थी बेसुध, नंगे पैर, कुछ आठवाँ या नौवा महीने का गर्भ लिये. मैं वही ठिठक गयी, मैं बहुत देर तक उसे देखती रही. मैं बहुत देर तक अपने पागल नहीं होने पर शर्मिंदा होती रही.

और फिर पूरे रास्ते मुझे वो पागल याद आई, घिन सी आई हम पागलों की बस्ती के लोगों से जिन में से किसी ने उसे यह अनचाहा गर्भ दे दिया.  कुछ दिन पीछे जाते हैं. मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का स्कूल है, मैं यहाँ पढ़ाने जाती हूँ. इनमे से कुछ बच्चे मूक बधिर भी हैं और सभी प्रकार की विकलांगता को एक अम्ब्रेला में डालने से “मैनेज” करना आसान हो जाता है.  मैं यहाँ साइन लैंग्वेज सिखाती हूँ और इनसे बिना शब्दों का निश्चल प्रेम सीखती हूँ. तो ये सरासर लफ्फाज़ी है कि मैं इन्हें कुछ सिखाती हूँ.

अगस्त की एक शाम है, मूसलाधार बारिश हो रही है, दिन भर की व्यस्तता के बाद अभी अभी लौटी हूँ, चाय लेकर बैठी ही हूँ कि उसी स्कूल से एक फ़ोन आता है:

“हेलो चतुर्वेदी मैडम”

“हेलो पूजा, कैसी है आप?”

“मैं ठीक हूँ मैम, आप बताइये कैसे याद किया?”

“पूजा क्या आप यहाँ आ सकती हैं  प्लीज”

“इस एवरीथिंग ओके?”

“आप आइये मैं बताती हूँ”

मैं तुरंत ही स्कूल की ओर चल देती हूँ. वहां पहुँच के प्रिंसिपल के कमरे में जाती हूँ और वहां वार्डन को बैठे देखती हूँ. मन में एक डर सा आ जाता है,

“आइये डॉ पूजा, आप तो पूरा भीग गयी हैं, कुछ लेंगी आप चाय या कॉफ़ी ?”

“एक कप चाय लूंगी  और साथ में ये बतायें कि इतनी जल्दबाजी में कैसे बुलाया?”

“बात दरअसल ये है कि आराधना………आराधना को जानती हैं न आप? (मैं हाँ में सर हिलती हूँ), आराधना के आज महीने शुरू हुये , हॉस्टल की दोनों केयरटेकर थक गयी हैं पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, वह बार बार सेनेटरी नैपकिन निकाल कर फेंक देती है. वो आपके काफी करीब है, अगर आप उसे समझा देतीं तो …………….”

और वो रुक जाती हैं, जानती हूँ यह आग्रह भर नहीं है, ये एक भरोसा  है जो मैं तोड़ नहीं सकती .

मैं हॉस्टल की ओर बढती हूँ, आराधना अपने कमरे में गुमसुम बैठी है, मुझे देखते ही चहक उठती है. यहाँ मैं बता दूँ कि आराधना लो IQ वाली मूक बधिर लड़की है. मैं आराधना को लेकर गार्डन की तरफ जाती हूँ और हम दोनों एक चबूतरे के नीचे जाकर बैठते हैं.

मुझे माँ की याद आती है जिसने सर पर हाथ फेरते हुये हमें पहली बार महीने/पीरियड्स के बारे में सब समझाया था और आज मुझे ऐसा ही कुछ करना था. मैं आराधना को समझाती हूँ और उसके चौथे- पांचवे बार सेनेटरी नैपकिन को फेंक देने के बाद से किसी तरह ये समझाने में सफल रहती हूँ कि सेनेटरी नैपकिन कितना ज़रूरी है उसके लिये , अब आराधना शांत हो गयी है, वह चीखती नहीं, चिल्लाती नहीं मुझ पर बस सर टिका के बैठ जाती है पर मेरे मन में मचा है एक तूफ़ान, एक तूफ़ान जो शिकायत है मेरी तुम्हारे भगवान, अल्लाह, इशु और वाहे गुरु से.

मुझे शिकायत है हर उस चीज़ से जिसे हम पूजते है, जिसे प्रसाद और कुछ चढ़ावे का रिश्वत दे सब अपनी अर्जियां उसके पास पहुंचाते हैं, पर मुझे एक जेन्युइन शिकायत है उससे- अगर तुमने अराधना जैसी  कितने लडकियों को कुछ भी नार्मल नहीं दिया तो ये हर महीने का सरदर्द क्यूँ ? जब तुमने उन्हें मेंटली एक्टिव नहीं बनाया तो सेक्सुअली एक्टिव क्यूँ? और सेक्सुअली एक्टिव बनाकर तुमने छोड़ दिया उन्हें असुरक्षित हम पागलों  की एक ऐसी दुनिया में जहाँ कितने लोग घात लगायें बैठे हैं. उन्हें किसी  के छूने पर कोई सरसराहट तो होती नहीं  होगी न ही कोई शारीरिक आकर्षण. और यह सिर्फ लड़कियों के साथ नहीं है. कितने ही लड़के चाइल्ड केयर होम्स से चाइल्ड एब्यूज का शिकार होते हैं.

जब पहली बार लोकल ट्रेन में एक पागल औरत को लेबर पेन  होते देखा था तब घिन आई थी ये सोचकर इनका रेप करने से किसी को क्या प्लेज़र मिलता होगा. पर फिर ध्यान आता है कि कितना रिस्क फ्री होगा इन औरतों का रेप करना, ये थाने नहीं जाती, ये FIR नहीं करवाती, कोई कैंडल लाइट मार्च नहीं, कोई पोलिटिकल इस्श्यु नहीं, कोई महिला कमीशन नहीं. इनके प्रति तो किसी की भी कोई जिम्मेदारी नहीं होती. बस हम सो कॉल्ड सभ्य समाज के लोग जो पागल नहीं हैं इन्हें ऐसा देख कर दुखी होते हैं, उन दरिंदों को चार गाली देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं.

अब आराधना को नींद आ गयी है, वह सो रही है और मैं उसके बालों में उंगलियाँ फेर रही हूँ. चाहती हूँ कि वो सुरक्षित रहे इन चार दीवारों के पीछे, बाहर की दुनिया बड़ी क्रूर है – नीचे कुछ भेड़ीयें घूम रहे हैं और ऊपर वाले ने न जाने क्या सोच के तुमको सेक्सुअली एक्टिव बना दिया.

मुझे तुम्हारी फ़िक्र होती है अरु क्यूंकि मेरी नज़रों से वो नंगी, पागल औरत नहीं जाती एक पल के लिये भी.

एक बंद खिड़की जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं

एक बंद खिड़की

जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं

खटखटाती हूँ पुरानी लकड़ी के पाले

बाहर की तेज़ बारिश के शोर में

गुम हो जाती है ये आवाजें

कुछ खटखटाहट

थोड़ी सिसकियाँ

बंद किवाड़ों के पीछे

सीलन भरी दीवारों से लगे

बैठी है कोई पुरानी कहानी

एक वक़्त के किस्से पुराने पर्दों

से टंगे पड़े हैं किसी कोने में

जानती हूँ बह रही है आवाज़

पहुँचने से पहले तोड़ देती है दम

पूछ रही हूँ फिर भी

कोई है? क्या कोई है अन्दर ?

 

तुम होती तो क्या आज साथ होती

डिअर नानी

(तुम अभी होती तो डिअर का मतलब समझाते तुम्हें खालिस जौनपुरिया भोजपुरी में ).

कुछ दिन ऐसे होते हैं जब आप बस कहीं छिप जाना चाहते हो, एक ऐसी थकान जब किसी होने के न मायने समझ आते हैं और न किसी न होने के कारण दिखते हैं, ऐसे ही दिन आज तुम मुझे याद आती हो.

सोचती हूँ कि तुम होती तो कैसी होती: कहानी सुनाने वाली प्यारी सी नानी या क्या तुम हमें बगीचे से आम चुराकर तोड़ने पर डाँटने वाली नानी होती, क्या तुम रोटी में घी चुपड़ कर ये कहती कि “घी खा नहीं तो बच्चे कैसे जनेगी” या हर बात पर “एक हमारा ज़माना था” वाली नोस्टालजिक नानी होती.

illustration by pragon fine art

तो डिअर नानी, इन सभी “क्या “ के जवाब मुझे कभी नहीं मिल पायेंगे क्यूँकि सच तो ये है कि मैंने तुम्हें कभी देखा ही नहीं और न ही मैंने तुम्हारी कभी कोई तस्वीर देखी है. फिर भी आज याद आती है तुम्हारी, बिना देखे, बिना सुने, बिना जाने क्या किसी की याद आ सकती है? पर डिअर नानी, आज जो तुम्हें मैं ये चिट्ठी लिख रही हूँ तो तुम्हारी तस्वीर बनाना भी जरुरी है.

कैसी दिखती होगी तुम?
सोचती हूँ कि अगर मैं माँ जैसी दिखती हूँ तो माँ तुम जैसी दिखती होगी. तो मेरे मन के पिक्चर फोल्डर में तुम दिखती हो मुझे माँ जैसी, सफ़ेद बालों के साथ, सीधे पल्ले वाली साड़ी पहने, सर पर पल्ला डाले, सिन्दूर भरी बीच से मांग निकाल कर बालों को बांधे और माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी .हो सकता है तुम वैसी न दिखती हो, पर मेरी कल्पना में लाल बिंदी वाली मेरी नानी ऐसी ही दिखती है.

न तुम सिर्फ बहुत जल्दी इस दुनिया से चली गयी पर “पता है मेरी नानी कहती है” वाली मेरी कहानियाँ भी अपने साथ ले गयी. कहानियाँ – मेरी माँ के बचपन के किस्से, नदी किनारे रहने वाले उस भूत की कहानी जो खाना न खाने वाले बच्चों को पकड़ता होगा, राम सीता की वही कहानियाँ जो तुम अनेको बार दोहराती, राजा रानी के किस्से जिसमें शायद तुम हमें सीख ढूँढने बोलती, बूढ़ों वाली चिढ़चिढ़ाहट या फिर तुम्हारे हाथ का बना कुछ अच्छा सा खाना, सब कुछ तो ले गयी तुम अपने साथ.

लाल बिंदी वाली तुम

पर कभी कभी तुम्हारी याद आ जाती है जब कोई अपनी नानी का ज़िक्र करता है या कभी बिना किसी मतलब के भी और उस याद में तुम दिखती हो माँ जैसी, लाल साड़ी पहने, सर पर पल्ला डाले, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी.

डिअर नानी, तुम्हें फिर कभी लिखूंगी कोई और चिठ्ठी, कितना कुछ तो है तुम्हें बताने को और उस चिठ्ठी से तुम्हें ले आउंगी कुछ देर के लिये अपने पास क्यूँकी याद आती है तुम्हारी.
आज बहुत याद आ रही है तुम्हारी.

पूजा

बैंगनी फूल

“क्या बकवास खाना है यार, इसे खायेगा कोई कैसे” विशाल ने टिफ़िन खोलते ही कहा. “ अगर ४ दिन और ये “खाना खाना पड़ा तो मुझसे न हो रही इंजीनियरिंग, मैं जा रहा वापस अपनी पंडिताइन के पास.”

“सुन हीरो, बाज़ार से लगी गली के आखिरी में एक पीला मकान है, एक आंटी खाना खिलाती है. और क्या बढ़िया बनाती है.” अजीत ने सिगरेट जलाते हुए कहा.

“पता चला मुझे और अगर मेरे पंडित बाप को पता चला कि मैं मुसलमान के यहाँ खाना खा रहा हूँ तो जनेऊ रखवा के चलता करेगा मुझे.”

तीन दिन बाद विशाल बाज़ार के तरफ टहल रहा था तो उसे वही पीला मकान दिखा. सोचा चल जाकर देखते हैं, जनेऊ है, जीपीएस थोड़े कि पंडित को पता चल जायेगा. कम से कम जान तो बची रहेगी.

विशाल ने दरवाज़ा खटखटाया. बेहद मामूली सा घर था, जगह जगह पेंट उखड़ा हुआ था,हाथ से बुनी हुई झालर जो अब बेरंग हो चुकी थी, दरवाज़े पर लटक रही थी. सुबह ही टूटे हुए गमले में किसी ने पानी दिया था जो नीचे फर्श पर फैला हुआ था, गमले में बैंगनी फूल लगे हुए थे. उस बेरंग से लैंडस्केप में वो बैंगनी फूल कुछ मिसफिट लग रहे थे.

तभी एक बूढी औरत ने दरवाज़ा खोला. “जी बेटा” सर पे पीला दुपट्टा डाले एक औरत सामने खड़ी थी जिसके किनारे से सफ़ेद बाल झाँक रहे थे. उस पीले दुपट्टे का रंग कई साल पहले शायद उड़ चुका था और उस कपडे पर बस पीली खुरचन रह गयी थी.

“ आंटी जी मैं यहाँ इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ता हूँ. वो टिफ़िन का पूछने आया था”

“आओ बेटा, अन्दर आओ. बाहर तेज़ धूप है. शाहीन ज़रा एक गिलास ठंडा पानी तो ले आओ”

रसोई में कुछ हलचल हुई, शायद किसी ने कोई किताब बंद कर प्लेटफार्म पर गुस्से में पटकी, या हो सकता है उसका वहम हो. वह खोया ही हुआ था कि एक आवाज़ कानों में पड़ी “पानी”. सर उठाया तो उसकी नज़रें दो उदास आँखों से टकराई. उदासी भी खूबसूरत होती है ये उस दिन जाना.

काले दुपट्टे के बीच से कुछ बाल उसके चेहरे पर गिर रहे थे. कमरे में बिजली नहीं थी इसलिए पसीने की कुछ बूँदें माथे पर टिक गयी थी. पसीने की बूँदें भी उसके माथे से हटने से इनकार कर रही थी.विशाल का काशी बहुत पीछे छूट गया था बस सामने थी तो वो दो आँखें जो सामने से तो कभी का जा चुकी थी पर हट नहीं रही थी.

और अगले दिन से विशाल हर रोज़ खाने के लिए वहां जाने लगा. पता लगा शाहीन विमेंस कॉलेज में पढ़ती है, अब्बू कुछ साल पहले गुजर गए थे बस तभी से माँ बेटी टिफ़िन का काम कर के गुजारा चला रहे थे. और फिर जैसा होता है, विशाल ऑटोमैटीकली शाम को विमेंस कॉलेज के बाहर दिखने लगा. फिर पब्लिक लाइब्रेरी में बैठने लगा,बिना किताब पढ़े बैठा रहता, पर कभी शाहीन से बात करने की हिम्मत नहीं हुई.

आज शाहीन लाइब्रेरी के जगह बाज़ार की ओर निकली, निकली क्या उसकी सहेली उसे खीच कर ले जाने लगी. सहेली खरीदारी करती रही और शाहीन उसको बताती रहती कि क्या अच्छा लग रहा है. तभी शाहीन कि नज़र बैंगनी चूड़ियों पर पड़ी.विशाल ने देखा कि चूड़ियों को देखकर उसके आँखों के कोनों पे आंसूं टिक गया था.

“अरे तुझे क्या हुआ?” सहेली ने पूछा.

“कुछ नहीं यार, अब चलें कि तुझे पूरा मार्किट खरीदना है?”

“ पहले बता कि तू ऐसे दुखी क्यूँ हो गयी”

“अरे दुखी नहीं हूँ, बस अब्बा की याद आ गयी”

“चल तेरा मूड ठीक करते हैं.गोल गप्पे खाएगी?”

वो दोनों गोल गप्पे खाने लगे और शाहीन अपनी सहेली को बताने लगी कि कैसे एक ईद पर उसने परी वाली फ्रॉक कि जिद पकड़ी थी. अब्बा ने उसके लिए बैंगनी फूलों वाली फ्रॉक खरीदी जिसे देखकर वो रोने लगी.फिर अब्बा ने उसे बैंगनी परी की कहानी सुनाई, जो अब्बा ने उसे कन्विंस करने के लिए बनाई थी. ये किस्सा बताते हुए शाहीन जोर से हंस दी और उसकी सहेली ने उसे गले लगा लिया.

“बेटा एक हफ्ते मेस बंद होगा.”

“अरे क्यूँ आंटी” विशाल का कौर गले में ही अटक गया.”ईद कि वजह से?”

“अब ईद जैसा तो कुछ है नहीं बेटा, सोच रहे हैं इसकी फूफी के पास हो आयें, ईद पर मिलना भी हो जायेगा और उनकी तबियत भी कुछ ख़राब रहती है. बेटा वो इस महीने के पैसे मिल जाते तो, सफ़र का खर्चा निकल जाता.”

“जी आंटी,मैं आज शाम को ही दे जाऊंगा”

“और घर जा रहे छुट्टियों पर तो अपने अम्मी अब्बा को मेरा सलाम कहना बेटा”

“जी आंटी”

विशाल थोड़ा परेशान हो गया, एक हफ्ता बिना शाहीन को देखे, उसने आज तक उससे बात नहीं कि थी, वो उसे हमेशा देखती थी कॉलेज में, लाइब्रेरी में. पर किसी ने कभी कुछ कहा नहीं.

शाम को विशाल पीले मकान के सामने जाकर तीन बार लौट आया, उसे पता था हमेशा कि तरह शाहीन बाहर कुर्सी डाल कर पढ़ रही होगी. उसने दरवाज़ा खटखटाया. अन्दर से आवाज़ आई “कौन?”

“जी मैं विशाल आंटी “

“आओ बेटा, चाय पियोगे”

“पिला दीजिये आंटी, मन तो है. आंटी ये आपके पैसे”

“शुक्रिया बेटा”

आंटी चाय बनाने को उठी, तो विशाल शाहीन के पास जल्दी से एक पैकेट रख के आ गया.

“आंटी मुझे कुछ काम याद आ गया, मैं चलता हूँ” वह रसोई कि ओर देख के चिल्लाया.

“अरे चाय तो पीते जाओ बेटा”

“नहीं आंटी, चलता हूँ. आपको ईद मुबारक “

“तुमको भी बेटा”

ईद के एक दिन पहले कि रौनक बाज़ार में थी, चारों ओर हलचल थी, लोग खरीदारी कर रहे थे. रात के आखिरी पहर में शाहीन ने वो पैकेट खोला. अन्दर वही बैंगनी चूड़ियां थी. एक छोटी सी रंग बिरंगी गुड़िया भी साथ में रखी थी. वह मुस्कुरा दी, आँखों में फिर वही कमबख्त आंसू आकर टिक गए थे. पर आज आँखें उदास नहीं थी. बाहर ईद का चाँद मुस्कुरा रहा था और अन्दर शाहीन.

 

हमारी नफरतों के बीच एक माँ

एक अजीब से घिनौने समय में हम जी रहे हैं, जहाँ एक होड़ मची हुई है कि “तेरी वाली देशभक्ति, मेरी वाली देशभक्ति“ से कम कैसे. मुझे गुरमेहर की भी बात बचकानी लगती है और उसे जवाब देने वाले सो कॉल्ड देशभक्तों पर तो तरस आता है जो अपनी बात रखने के लिये पहले दलील देते हैं और जब दलील चुक जाती है तो रेप की धमकी देते हैं.

इस सारे तमाशे के बीच मैं कुछ समय पीछे जाती हूँ. वॉर हीरोज पर एक डाक्यूमेंट्री बना रही हूँ, प्रोफेसर एस.के नैयर से उनके घर पर मिलती हूँ. उनसे लम्बी बातचीत करती हूँ कैप्टन अनुज नैयर, महावीर चक्र के बारे में. ढेर सारे किस्से और तस्वीरें. 24 साल के बेटे को जंग में खो चुकी एक माँ बाहर निकलती हैं जो आधी मुस्कान के साथ मेरे नमस्ते का जवाब देती हैं. मुझे पहले ही प्रोफेसर नैयर बता चुके हैं कि अपने बेटे के शहादत के बाद उन्हें जितनी तकलीफों का सामना करना पड़ा, उसके बाद अनुज की माँ किसी से भी बात नहीं करती.

एक जोड़ी पथराई आँखें, वो आँखें आज भी मेरा पीछा करती हैं. जब आप ये देशभक्ति का नाच करते हैं तो मुझे सिर्फ Mrs नैयर की दो पथरायी आँखें दिखाई देती है. जंग में चली गोली से एक सैनिक शहीद होता है, और हमारी उदासीनता से एक परिवार ख़त्म हो जाता है. हम सिर्फ शोर मचाते हैं, आज देशभक्ति पर, कल सलमान की शादी पर और परसों किसी और मुद्दे पर. हमे सिर्फ कहना है, सुनना नहीं है. और जो हमारी बात नहीं सुनेगा उस पर हम चिल्लायेंगे, गाली देंगे, मारेंगे और रेप जैसा हथियार तो है ही, हर जगह काम आ ही जाता है.

जब ये नंगा नाच ख़त्म हो जाये और इस बात पर निर्णय हो जाये की कौन सही है और कौन गलत तो याद रखना कि कारगिल युद्ध ख़त्म होने के 18 साल बाद भी एक माँ को ना तुम्हारी fanatic देशभक्ति से कोई मतलब है और ना तुम्हारी ट्रिपल सेंचुरी से, उसे आज तक यही बात सालती है कि शहादत के दिन उसका बेटा बिना कुछ खाये ही जंग में चला गया.

इस बारगी ये पत्त्थर तो तबियत से उछला है यारों

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के पहले दिन ही अमेरिका ने अपने इतिहास का सबसे बड़ा विरोध देखा, वाशिंगटन डीसी में 5 लाख से भी ज्यादा लोगों  ने  आज #Women’sMarch के तले एक विरोध मार्च में हिस्सा लिया और नये राष्ट्रपति को कड़े शब्दों में कहा कि समानता और अधिकारों की ये लड़ाई जारी रहेगी और अमेरिका जिन मूल्यों से बना है वे  किसी भी प्रशासन को उनसे खिलवाड़ नहीं करने देंगे .
आखिर ये शुरू कहाँ से हुआ – चुनाव के नतीजों के दिन हवाई की एक महिला टेरेसा शुक ट्रम्प के निर्वाचित होने से इतनी निराश थी कि रात १२ बजे उन्होंने फेसबुक पर एक इवेंट पेज बनाया जिसमें उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प की हेट politics के खिलाफ मार्च करने की बात कही, सुबह 5 बजे तक उनके पास 10000 लोगों ने us मार्च में शामिल होने पर सहमती जताई.और दो दिन बाद मेन्हेटन के एक रेस्तरां में #Women’sMarch की तैयारी हो रही थी. तय हुआ कि राष्ट्रपति के शपथ लेने के दुसरे ही दिन यह मार्च होगा यह बताने के लिये कि “आप हमें जितना नीचे गिराएंगे हम उतनी ही बार ऊपर उठेंगे”,#Women’sMarch का कोई नेता नहीं है, पर इसके इतने बड़े स्वरुप के लिये फेसबुक जरुर श्री ले सकता है. यह वाशिंगटन डीसी से होते हुए विश्व के दूसरे हिस्सों में भी उतनी ही बड़ी संख्या में देखा गया और हॉलीवुड के कई सेलेब्रिटी ने न सिर्फ इस मार्च में हिस्सा लिया बल्कि इसे एक एक्टिव राजनीतिक मूवमेंट बनाने की बात भी रखी.

यह कितना बड़ा राजनीतिक वक्तव्य बनेगा यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा पर “pink pussyhats ” पहनी करोड़ों  की संख्या में उठी आवाजें चीख में बदल रही हैं, नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जितना जल्दी सुन लें उतना अच्छा, आइये ले चलते हैं आपको #Women’sMarch में इन शानदार तस्वीरों से

स्त्रोत – Getty Images, Huffington Post, Buissness Insider, Time

मेरा हीरो बूढ़ा हो चला है

हम सब के हीरो होते हैं, हमारी जिंदगी के वो हिस्से जिस पर हमारा हक होता है, वो शख्स जो हमें भरोसा दिलाता है कि उसके होने भर से ही सब कुछ ठीक हो जायेगा। एक बरगद का पेड़ मेरा हीरो है, जहाँ मैं भाग कर जाती हूँ जब कुछ ठीक न हो, जिसके पीछे मैं छुप जाती थी जब हॉरर मूवीज़ के उन स्टुपिड भूतों से मुझे डर लगता था, एक ऐसा बरगद जहाँ पहुँचकर गलतियों  का स्कोर ज़िरो हो जाता है, एक ऐसा हीरो जिसकी छाँव ज़िदगी की कड़ी धूप से बचा कर रखती है। 
हॉस्पिटल का कमरा है, मैं अंदर जाने के लिये दरवाज़ा खोलती हूँ तो पीछे से एक गार्ड की आवाज आती है “ये आईसीयू है, जनरल वार्ड नहीं कि जब मन करे तब चले आओ” हॉस्पिटल, जहाँ मेरा बरगद है, हॉस्पिटल जो याद दिलाता है कि मेरा हीरो बूढ़ा हो रहा है।

पापा कमरे में आ गये हैं, एक लंबी रात है हमारे बीच में। पापा को अपनी लिखी कहानी सुना रही हूँ, ये एक रोल रिवर्सल है जो मुझे पसंद नहीं क्यूँ कि मेरा हीरो बूढ़ा हो गया है। पापा कहते हैं नर्स से कि मेरी बेटी प्रैक्टिकल है, डॉक्टर है ना, वो रोती नहीं , बड़े होने के इस पूरे प्रोसेस में हम झूठ बोलना सीख जाते हैं, अपने हीरो के सामने रोना भी किसे पसंद होता है।

अपने हीरो को बूढ़ा होते देखना भयावह होता है, अपने बरगद को खुद पर टिकाने के लिये आप कभी तैयार नहीं होते, ना एक डॉक्टर का मास्क लगा के ना बड़े होने का। आप भी सोच रहे होंगे कि मैं ये सब क्यूँ लिख रही हूँ, लिख रही हूँ क्यूँकि नास्तिक होने के नाते मेरे पास “ऊपर वाला सब ठीक कर देगा ” वाली सबसे ओवरयूस्ड लाईन नहीं है। लिखना मेरा escape point है, लिखने से मैं खुद को बचा ले जाती हूँ।

बड़े होने का एक हासिल यह भी है – लिखना और सब ठीक है ऐसा सोचना। पर हॉस्पिटल की वेटिंग में लिखी इस बकवास का एक सच यह भी है कि मेरा हीरो बूढ़ा हो रहा है।

तुलसी का पौधा

वह हर रोज़ नींद से हड़बड़ा कर उठा जाती, बुरे सपने उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहे थे. रोज़ अधूरी सी नींद के बाद सुबह उठती तो थकी हुई, चिढ़ी हुई. सपने में सब कुछ भरभराकर गिर जाता और वो उसे थाम नहीं पाती थी.

” बहुत ख़राब सपने आते हैं यार, परेशान हो गयी हूँ.”

“एक काम करो, तुलसी का पौधा लगा लो घर में. बुरे सपने नहीं आयेंगे और डर भी नहीं लगेगा”

” मतलब कुछ भी, साइंस के ज़माने में, एक तरफ हमने गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है और दूसरी तरफ ये तुलसी के पौधे की थ्योरी. उफ़! मैं अथिस्ट हूँ, नास्तिक ये तुलसी वाली बात कम से कम मुझसे तो न कहो”.

फिर एक दिन उसे किसी ने तुलसी का पौधा दिया, उसे उन  ख़राब सपनों की बात याद हो आई, वह हँसी और तुलसी को घर लाकर भूल गयी.

साल की एक ऐसी  सुबह जब वक़्त पिछली  रात का हाथ छोड़ने ही वाला  था  तो एक कॉल आया.

किसी अपने की तबियत ख़राब थी, फ़ोन के दूसरी ओर वह कह रही थी कि सब ठीक हो जायेगा और फ़ोन के इस तरफ आंसुओं से बना एक डर बड़ा हो रहा था धीरे धीरे.

रात में बहुत देर तक वो करवट बदलती रही, नींद आँखों से गायब थी.अब तक डर काफी बड़ा हो चुका था और सामने खड़ा उसे घूर रहा था.

वह उठी और बालकनी की लाइट जलायी. बालकनी की लाइट शायद फ्यूज हो चुकी थी, मोबाइल की रौशनी में वह कुछ ढूँढने लगी चारों तरफ.

“थैंक गॉड, मिल गया”

वही तुलसी का पौधा पड़ा था एक कोने में, मिटटी सूख कर झड़ रही थी आस पास.उसने तुलसी के पौधे से मिटटी झाड़ी, और उसमें थोड़ा थोड़ा पानी डालती रही धीरे धीरे , पूरी तरह वो नहीं सूखा था.दो छोटे पत्ते अभी तक हरे थे.

तुलसी के पौधे पर पानी डाल के, उसे ध्यान से रखकर वो वापस आई. डर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.

 

 

हम सब में दरार है जो दिखती नहीं 2: सिर्फ ब्रेकअप से डिप्रेशन नहीं होता

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दरार जो बताता है कि कुछ टूट गया है, कुछ दरक गया है, शायद आर पार नहीं, कोई टुकड़ा नहीं पर दरार बताती है कि कुछ टूटा जरुर है. कुछ पिघल गया है अन्दर मोम की तरह जो चाह कर भी वैसा नहीं हो पा रहा जैसा पहले था. पर जरुरत भी क्या है पहले जैसे होने की, हम कोई नया, कोई सुन्दर ढांचा भी तो ले सकते हैं ….आखिर जीना इसी का नाम है.

मैं मिलती हूँ एक ऐसी लड़की से जिसने अपना काम छोड़ दिया और घर आकर रहने लगी है . एक ऐसा काम जिसे हम सब सफलता के और आगे बढ़ने के पैमाने मानते हैं. मैं पूछती हूँ क्यूँ, वो कहती है “डिप्रेशन में है”. मैं  पूछने की जरुरत नहीं समझती, अपने आप ये मान बैठती हूँ कि कोई ब्रेकअप या दिल टूटने का चक्कर होगा. मैं एक डॉक्टर होकर भी ये ऑटो मोड में मान बैठती हूँ. पता चलता है कि ऐसा कुछ नहीं था. सब सही जा रहा था- एक अच्छी खासी सैलरी बैंक में आ रही थी, एक फ्लैट था पास में, पासपोर्ट पर स्टाम्प लग रहे थे, वीकेंड भी मजेदार होता था , डेटिंग भी हो रही थी ……फिर ये डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ का किसी के पास कोई जवाब नहीं. बस यूँ ही मन उचट जाता है हर उस चीज़ से जिसे हम एक माइलस्टोन की तरह देखते हैं, हमारी बकेट लिस्ट में शायद टिक लगते रहे पर हम उतने ही उदास भी हो सकते हैं. ये बेवजह, बेमतलब और बेहद उदास करने वाला होता है. ये डिप्रेशन होता है. डिप्रेशन सच में एक दरार की तरह है जिसे न थामा गया तो सब कुछ ढह जाता है, देखते देखते हमारे सामने. और हम वही एक प्रश्न के साथ पीछे रह जाते हैं- पर डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ के पीछे क्यूँ भागना. क्या सच में अगर हमें क्यूँ मिल भी जाए तो क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा? नहीं……कभी नहीं. अवसाद या डिप्रेशन किसी भी क्यूँ, क्या, कैसे और कहाँ से ऊपर उठ चुका होता है. मैं अपनी उस नयी सहेली को अपने बचपन का किस्सा सुनाती हूँ जब मैं एक मेले में खो गयी थी और सिर्फ इसीलिए “खोया पाया सेण्टर” में आये अपने माँ पापा को पहचानने से इनकार कर दिया था क्यूंकि उस सेंटर में मुझे सेब खाने को दिया गया था और मुझे डर था कि अगर मैंने माँ पापा को पहचाना तो वो सेब वापस ले लिया जायेगा.

वह जोर से हंसती है, इतने जोर से कि उसकी आँखों में आँसूं आ जाते हैं. तो बस अपने डिप्रेस्ड दोस्त, भाई, बहिन, किसी जाने पहचाने वाले को इतने जोर से हंसाओ कि आँसूं आ जाये. आओ सड़े हुये जोक्स मारें, आओ बेवकूफियां करें, आओ हम भूल जायें कि हम बड़े हैं और बिना किसी कारण के, बिना किसी मतलब के बस ठहाके मार के हँसे और उन्हें वापस ले आयें. आप जानते हैं कि मैंने आंसूं लाने की बात क्यूँ की ? आँसू दिखाता है कि जो जम गया है वो पिघल रहा है और जब तक वो पिघलेगा नहीं हम उससे कुछ नया, कुछ सुन्दर कैसे बनायेंगे.

दवाओं को अपना काम करने दीजिये बस दोस्ती की, इंसान होने के पंख लगा दीजिये. फिर देखिये कौन  सा डिप्रेशन, कैसा डिप्रेशन. हमें समझना होगा, हमें समझाना होगा, हमें साथ देना होगा हर उस शख्स से जो लड़ रहा है ये लड़ाई, इस लड़ाई में इंसान बीमारी से बाद में हारता है किसी के न परवाह करने से, अपनों की उदासीनता से पहले हार जाता है. आप जिनसे प्यार करते हैं, जो आपकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं, उनका हाथ पकड़िये, उन्हें बिना किसी जजमेंट के सुनिये, उनकी जगह खुद को रखिये, उनकी उदासी के पीछे छिपे एक खूबसूरत चेहरे से उन्हें फिर से मिलाइये क्यूंकि सच तो ये है कि……

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं.

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हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं

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Courtesy:Andrew Mclachlan Photography

कुछ दिन पहले पोएट्री के  एक इवेंट में गयी थी .यहाँ 15 लोग आये थे, 15 अजनबी जो एक दूसरे को बिलकुल भी नहीं जानते थे, 15 कहानियाँ, 15 कवितायेँ, 15 मन  और सैंकड़ों दरारें. साथ में रहते, एक दूसरे को अपनी ज़िन्दगी में आने का, झाँकने का न्योता देते वे 15 लोग एक दूसरे को बिल्कुल नहीं जज कर रहे थे. समझने की कोशिश कर रहे थे, सहारा देने की कोशिश, 14 जोड़ी आँखें जो हर किसी को कह रही थी “सब ठीक हो जायेगा”.

हमने बातें की, लम्बी बातें और मैंने जाना कि ख़ुशी कितनी सब्जेक्टिव चीज़ होती है. हम फासलों के बीच तैरते हैं, फैसलों पर रुकते हैं ,एक ख़ुशी का दौर तो एक तकलीफ की लहर और इन्हीं सब के बीच हम ज़िन्दगी नाम की किताब के क्लाइमेक्स में पहुँच जाते हैं. हम सभी 18-30 की उम्र के थे. हमने बातें की अपनी कमजोरियों के बारे में, अपने डर के बारे में, अपनी गलतियों के बारे में, अपने सपनों के बारे में और अपने अपनों के बारे में.

मैंने जाना कि हर dysfunctional family, हर टूटते हुये रिश्ते, हर विश्वास की दरें लांघता कोई टच,  हर ऊँची आवाज़ और हर दबी हुई सिसकी के निशान होते हैं, निशान जो पीछे छोड़ जाते हैं मानसिक बीमारी के रूप में. मेंटल इलनेस सिर्फ पागलपन नहीं होता, यह बस यूँ ही रुलाई फूट जाने वाले डिप्रेशन से शुरू होकर मैनियाक तक पहुँच सकता है.

मैं एक दोस्त से मिलती हूँ, चुप रहता है पर कवितायेँ इंटेंस हैं, ऐसी कविता जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जायें पर इस चुप्पी के पीछे कुछ है, ये वो सन्नाटा है जो चाहा  नहीं है, ये वो सन्नाटा है जो लड़ रहा है आपसे भीतर ही भीतर .पता चलता है कि वो बाइपोलर डिसऑर्डर से लड़ रहा है. यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसमे मन लगातार कई हफ़्तो तक या महिनों तक या तो बहुत उदास या फ़िर अत्यधिक खुश रहता है | उदासी में नकारात्मक तथा मैनिया में मन में ऊँचे ऊँचे विचार आते हैं | और मैनिया के एक ऐसे ही एपिसोड में उसने अपने साथ साथ 4 और लोगों की ज़िन्दगी को जोखिम में दाल दिया. उस दिन इसने सोचा कि मेडिकल हेल्प लेगा और तब से दवा ले रहा है. मैं उसे कहती हूँ कि इस बारे में  बात करने के कारण मैं बहुत इज्ज़त करती हूँ उसकी और वो जब चाहे मुझसे बात कर सकता है.

मिलती हूँ एक ऐसी लड़की से जो चाइल्ड एब्यूज के जख्म को अब तक पाले हुये है. उस बारे में बात करते उसके आँखों में डर तैर जाता है, हडबडाहट  दिखने लगती है, वो आँखें नहीं मिलाती, वो बात करते हुये भी बात पलट देना चाहती है. वो स्ट्रोंग सी दिखती लड़की जो डरी सहमी उस छोटी लड़की को बुलाती है, उसे गले लगाना चाहती है पर ठिठक जाती है और बस देखती है उस बच्ची को सुबकते. मैं उसे गले लगाते हुये कहती हूँ कि हम सबके सफ़र में कुछ अँधेरे हैं पर उनसे डरना नहीं है. वह मुस्कुराती है, कोर पर एक आँसू टिक गया है और उस आँसूं के रिफ्लेकशन.में मुझे वो बच्ची दिखाई देती है

ये जो आसान ज़िन्दगी दिखती है न बाहर से, ये किसी की आसान नहीं है. एक भीड़ में भी तनहा आदमी , अधूरी ख्वाहिशें की खुरचन में जीती वो औरत, किसी की उम्मीदों का बोझ ढोते एक लड़का, एक परफेक्ट से सांचे में खुद को घुसाते एक लड़की, बचपन में किसी शैतान के चंगुल में फंसना या किसी फ़रिश्ते का हाथ सर से उठ जाना या फिर बिना किसी वजह बस उदासी का पैठ जाना………..कितना कुछ तो तैयार करता है मेंटल इलनेस के लिये ज़मीन.

हमें समझना होगा, हमें समझाना होगा, हमें साथ देना होगा हर उस शख्स से जो लड़ रहा है ये लड़ाई, इस लड़ाई में इंसान बीमारी से बाद में हारता है किसी के न परवाह करने से, अपनों की उदासीनता से पहले हार जाता है. आप जिनसे प्यार करते हैं, जो आपकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं, उनका हाथ पकड़िये, उन्हें बिना किसी जजमेंट के सुनिये, उनकी जगह खुद को रखिये, उनकी उदासी के पीछे छिपे एक खूबसूरत चेहरे से उन्हें फिर से मिलाइये क्यूंकि सच तो ये है कि……

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं.