लाइट वाले जूते

“अब्बा मैं ईद पर लाइत वाले तूते लूँगा”, इकबाल ने अपनी तुतलाती आवाज़ में ज़फर से कहा. ज़फर पूरे दिन का थका घर आकर सुस्ता ही रहा था कि उसके ६ साल के बेटे ने फिर वही डिमांड रख दी जो वो पिछले ३ महीने से कर रहा था. पिछली बार जब परिवार के साथ छतरपुर के मेले में गया था तब उसने किसी बच्चे को लाइट वाले जूते पहने देखा था और देखता ही रह गया.

ज़फर ने लुबना के हाथ में पैसे पकड़ाए.

“बस 110 रूपये? इसमें घर कैसे चलेगा. बच्चों के स्कूल का नया साल आ रहा. महंगाई इतनी.”

“आज कल कुछ बिक्री नहीं होती, पूरा दिन धुप में घूमने के बाद भी. सोच रहा हूँ चौधरी भाईसाब से कुछ उधर लेकर कुल्फी का ठेला भी लगा लूं. गर्मी आरही, कुछ पैसे बन जायेंगे और इस ईद घर भी तो जाना है. गाँव दुआर जाते रहना चाहिए, हम दो साल से नहीं गए”

“मैं गाँव लाईत वाले तूते लेकर ताऊंगा. पिंटू, बबलू, मुन्नी, बाबु, सबको चिधाऊंगा”

“अच्छा बाबा तुम्हारे लिए लाइट वाले जूते लेंगे”………..ज़फर ने इकबाल को दुलारते हुए कहा.

603 नंबर के बस से वापस आते पूरे रास्ते इकबाल ने सिर्फ लाइट वाले जूतों पर सवाल पूछे. वो जानना चाहता था कि जूते बनाने के बाद उसमें लाइट डालते हैं कि लाइट बना के जूते. उस रात उसे सपने में एक उड़ता हुआ लाइट वाला जूता दिखा जिसमे रंग बिरंगी लाइट जल रही थी. वह जूता उड़ता हुआ उसके कंधे पर आकर बैठ गया और मुस्कुराने लगा.

तभी उसे आवाज़ आई “इकबाल! इकबाल!”

अरे लाइट वाले जूते को तो मेरा नाम भी मालूम है…………..इकबाल ने सोचा.

“इकबाल उठा जा, दिन चढ़ गया है”, ओह यह तो अम्मी की आवाज़ थी. इकबाल दौड़ता हुआ सड़क पे गया तो पापा का ठेला नहीं था.

वापस आया और अम्मी से पुछा “पापा चले गए?”

“नहीं तो क्या, पापा को काम करना पड़ता है. तुम्हारे जैसे दोपहर तक सोना नहीं”

“मैं भी काम करूँगा. लाइत वाले जूते लेकर पूरी दिल्ली में कुल्फी बेचूंगा. खूब तारे पैसे ताउंगा”

“और उन पैसों का क्या करेंगे आप”

“और लाइत वाले तूते खरीदूंगा”

लुबना खिलखिलाकर हंस पड़ी. तभी इकबाल के अब्बा आते दिखाई पड़े

“अरे आज इतनी जल्दी कैसे आ गए, खैरियत तो है”

“चौधरी जी कह रहे थे कि आइसक्रीम के ठेले नहीं निकाल रहे फैक्ट्री से. कल पूरा दिल्ली बंद है. “

“क्या कहीं फिर से दंगे हो गए”, लुबना के हाथ ऊपर की ओर उठे, दुआ के लिए और डर से उठे हाथ कितने एक जैसे होते हैं.

“नहीं कोई बीमारी फैली है, सरकार कह रही है कि जो बाहर निकलेगा, उसे ये बीमारी खा जाएगी. ”

“हाय रब्बा, ये कैसी बीमारी है. आप घर पे ही रहो. परसों दिल्ली खुल जाएगी तो चले जाना”

“पापा, लाइत वाले तूते….” परदे के पीछे से इकबाल ने कहा.

“लाइत वाले तूते भी आयेंगे और हम सब ईद पर गाँव भी जायेंगे, मैंने सेठ से कुछ उधार माँगा है”, कह कर ज़फर ने इकबाल को गोद में बिठा लिया.

पर दिल्ली नहीं खुली. घर में रखा आखिरी दाना भी खतम हो गया तो लुबना रोज़ राशन बांटने वालों की लाइन में सुबह लग जाती. औरतों को जल्दी मिल जाता, कभी चावल लाती, कभी आटा, कभी दाल. इकबाल को रोज़ सपने में लाइट वाले जूते दिखते. पर वो किसी से कुछ नहीं कहता. इकबाल का सूखा हुआ चेहरा देखकर एक दिन ज़फर सुबह सुबह ठेला लेकर निकल गया. सेठ से बहुत मिन्नत कर उसने कुछ फल बेचने को उधार में लिए . उसे पड़ोस के विजय ने बताया था कि पुलिस वालों को कुछ सामान दे दो तो जाने देते हैं.

छठी गली में पहुंचा ही था कि दो पुलिस वालों ने रोका

“ कहा जा रहे हो ये सवारी लेके जहाँपनाह, पता नहीं ये रेड जोन है”

“साहब बस एक घंटे में दो चार फल बेचकर आ जाऊंगा साब, बच्चा भूखा है घर पे साब. एक महीने से दूध नहीं देखा उसने”

“क्यूँ माँ को दूध नहीं आ रहा?” कहकर दोनों अपनी ही बात पर भद्दे से हंस दिए.

“जाने दो साब”

“नहीं चल वापस ले अपना ठेला”

“जाने दो साब. आप कुछ ले लो भले”

“साले रिश्वत देता है, दिल्ली पुलिस को” कहकर दोनों ज़फर को मारने लगे,

“तोड़ दो साले का ठेला”

ज़फर लड़खडाते हुए घर पहुंचा तो आधी बेहोशी की हालत में था. जिस्म मार से काल पड़ गया था और लुबना उसके चोट को साफ़ कर रही थी तो वो बडबडा रहा था “अब दिल्ली नहीं आऊंगा” अक्सर ज़फर रात में अचानक उठता और चिल्लाता “अब दिल्ली नहीं आऊंगा”.

एक दिन सुबह रामखिलावन ने आकर कहा “एक ट्रक वाला पटना तक ले जाने के लिए तैयार हुआ है. एक आदमी का 3000 रूपये मांग रहा. बच्चे को गोद में ले लेना तो बच्चे का बस 1000 लगेगा. ज़फर सेठ के पास दौड़ा

“तूने पहले ही ठेले का, फल का नुकसान कर दिया है. पैसे कहा से दूं तुझे”

“सेठ आखिरी बार मदद कर दो. सब चूका दूंगा. गाँव जाना है. घर में कुछ बर्तन बचा है भर, वो रख लो भले”

और बाकी भाइयों के साथ ज़फर उस ट्रक में निकल गया गाँव के लिए. ट्रक चल रहा था और इकबाल चाँद को देख रहा था

“इकबाल देख ईद का चाँद”

“ईद आ गयी पापा”, इकबाल ने चहकते हुए कहा.

“हाँ बेटा”

“पापा ?”

“हाँ इक्कू, जब गाँव पहुँच जायेंगे तब तुम्हारे लिये लाइत वाले टूटे……”

“पापा आपने सुबह से पानी नहीं पिया”, कहकर इकबाल ने अपनी बोतल पापा को दी ज़फर ने एक घूँट पानी पिया, उसे ध्यान आया कि सफ़र लम्बा है और पानी इकबाल के लिए बचाना है और इकबाल को गले लगा लिया.

इकबाल ने ईद का चाँद दिखा, उसे उसमें लाइट वाले जूते दिखे

ज़फर ने ईद का चाँद दिखा, उसे उसमें अपने गाँव के घर के आगे जल रही ढिबरी.

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