तुमने यूँ छुआ है वजूद को, जैसे कोई वतन की मिट्टी को छूता है

तुम आज 100 बरस की हो गयी अमृता. आज सब अपने अपने तरीकों से तुम्हे याद कर रहे हैं. लिखने वाले तुम्हारी कविताओं को कोट कर रहे तो देखती हूँ कि तुम्हारी मिसफिट इश्क की कहानी उससे भी कहीं ऊपर पहुँच गयी है.

हम सभी तुम सा होना चाहते हैं. हम सभी तुम सा हो नहीं पाते. और इस चाहने और न होने के बीच तुम आज भी जिंदा हो, एक हाथ में सिगरेट और एक हाथ में कलम लिए.

मेरे घर में मेरा एक कमरा है और जब से मुझे एक अलग कमरा मिला है, अमृता प्रीतम मेरे कमरे में मौजूद हैं या फिर ये कहूँ कि अमृता के कमरे में मैं मौजूद हूँ . लेटे हुये कुछ लिखती हुई एक धुंधली सी अमृता प्रीतम की ब्लैक एंड वाइट तस्वीर जो उनकी मौत के समय किसी अखबार से काटी थी और तब से अमृता इस दुनिया से चली गयी और मेरे कमरे में आ गयी.

पहली बार जब तुम्हारे बारे में सुना तो वही सुना, वो प्रेम कथा वो आइकोनिक प्रेम कथा जिसे हमने जिया है.एक टीनएज लड़की को जब पता चला कि वो साथ साथ रहते हैं तब मेरे सामने वही स्वाभाविक प्रश्न “बिना शादी के” और फिर शुरू हुई अमृता को जानने की, उन्हें जीने की एक अनवरत कोशिश.

अमृता- इमरोज़ से मेरे इश्क से सब वाकिफ हैं. अमृता एक मुक्त व खुले विचारों की ऐसी स्त्री जो बेबाक लिखती है अपने प्रेम के बारे में

““वह चुपचाप सिर्फ सिगरेट पीता रहता था, कोई आधी सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नई सिगरेट सुलगा लेता था और उसके जाने के बाद केवल सिगरेटों के बड़े – बड़े टुकड़े कमरे में रह जाते थे।

कभी…एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी। उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेटों के टुकड़ों को सम्भाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक – एक टुकड़े को अकेले बैठकर जलाती थी। और जब अंगुलियों के बीच पकड़ती थी, तो लगता था, जैसे उसका हाथ छू रही हूं।”

लगा मेरी खोज ख़त्म हुई. अमृता उस  उम्र में जब हम सेट सिस्टम के अन्दर औरतों और आदमियों के लिए ज़मीन आसमान का अंतर देखते हैं और सवाल करते हैं, ठीक उसी उम्र में हमें तुम मिलती हो. वो अलग ही मिटटी की बनी अमृता, वो रेयर स्त्री जो प्रेम में स्वतंत्र होती चली गयी जब उन्हें इमरोज से इश्क हुआ, तो कई बरस उनके साथ रही। जीवन की धूप – छांव में दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रहे। एक दूसरे पर कुछ थोपे बिना, सदा साथ बने रहे और जाते जाते कह दिया “ मैं तैनू फिर मिलांगी”

हर वो शख्स जो जुड़ा है मुझसे वो जानता है कि अमृता प्रीतम सिर्फ एक कवियत्री नहीं हैं मेरे लिये, अमृता प्रीतम मेरा ज़िन्दगी को देखने का नजरिया भी है. मेरा रसीदी टिकेट को कोट  करना, अमृता इमरोज़ के बारे में अपनी राइटिंग क्लासेज में बताना, आज आखा वारिस शाह नु को याद रखन : सबको भाता है सिवाय मेरे पापा के.मेरे पापा जिन्होंने अमृता प्रीतम का लिखा हुआ प्रायः सब कुछ पढ़ लिया उन्हें डर लगता है अमृता प्रीतम से.

हम सब हर दिन दो समानान्तर जीवन जी रहे होते हैं – एक, जो हमारे बाहर तमाशा चल रहा है और दूसरा ,जो हमारे भीतर कुलबुला रहा होता है। जब इन दोनों जीवनों के मध्य असमंजस की लहरें उफान लेने लगती हैं तो वही  पैदा करता है डर . डर कि हमारी बेटी वैसी न बन जाये जैसा किताबों में पढ़ा और पसंद किया था.वो कलम को स्याह में डूबाकर स्वतंत्रता की इबारत न लिखे, वह डिफाइंड जेंडर रोल्स में बस अपने लिये एक किरदार चुन ले और सामाजिक किले की चार दिवारी में सुरक्षित रहे, जिंदा भली ही न रहे.

पापा का यह डर देख कर मुझे रसीदी टिकेट का वो अंश याद आता है:

“बरसों पहले अमृता के ज़हन में एक काल्पनिक प्रेमी मौजूद था और उसे उन्होंने राजन नाम दिया था. अमृता ने इसी नाम को अपनी ज़िंदगी की पहली नज़्म का विषय बनाया.

एक बार अमृता ने  एक नज़्म लिखी. उसे उन्होंने ये सोचकर अपनी जेब में डाल लिया कि स्कूल जाकर अपनी सहेली को दिखाऊँगी.

अमृता अपने पिता के पास कुछ पैसे मांगने गईं. उन्होंने वो पैसे उनके हाथ में न देकर उनकी जेब में डालने चाहे. उसी जेब में वो नज़्म रखी हुई थी. पिता का हाथ उस नज़्म पर पड़ा तो उन्होंने उसे निकालकर पढ़ लिया.

पूछा कि क्या इसे तुमने लिखा है. अमृता ने झूठ बोला कि ये नज़्म उनकी सहेली ने लिखी है. उन्होंने उस झूठ को पकड़ लिया और उसे दोबारा पढ़ा. पढ़ने के बाद पूछा कि ये राजन कौन है?

अमृता ने कहा, कोई नहीं. उन्हें ऐतबार नहीं हुआ. पिता ने उन्हें ज़ोर से चपत लगाई और वो काग़ज़ फाड़ दिया.

अमृता बताती हैं, ”ये हश्र था मेरी पहली नज़्म का. झूठ बोलकर अपनी नज़्म किसी और के नाम लगानी चाही थी लेकिन वो नज़्म एक चपत को साथ लिए फिर से मेरे नाम लग गई.”

सोचती हूँ कि वो ब्लैक एंड वाइट तस्वीर हटा दूँ तो क्या पापा का डर ख़त्म हो जायेगा? पर अवचेतन में लेटी अमृता को कौन हटायेगा?

अमृता के लिये  जीवन यथार्थ से यथार्थ तक पहुंचने का सफर रहा. और फिर अमृता क्या सिर्फ एक तस्वीर में जिंदा है?

अमृता जिंदा हैं किसी अल्हड़ सी लेखनी में ,अमृता जिंदा है कविताओं के  पीछे छुपे नामों में, अमृता जिंदा है साहिर की आधी जली सिगरेट में, अमृता जिंदा है इमरोज़ के अकल्पनीय समर्पण में, अमृता जिन्दा है मेरे किताबों के पीले पन्नों में, अमृता जिंदा है पापा के डर में

तुम्हें 100 बरस मुबारक अमृता. ये उम्र की, साल की गिरहों से तुम खुद को कब का आज़ाद कर चुकी थी. ज़िन्दगी की सांझ में भी बेसाख्ता कह दिया था तुमने….

‘अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, दोपहर में क्यूँ न मिले.’

तुम्हारे होने का शुक्रिया अमृता.

“अज अमृता प्रीतम नु कितों कबरां विचो बोल !
ते अज किताब -ऐ -इश्क दा कोई अगला वर्का खोल !

 

2 Comment

  1. वाह ! इससे बेहतर अमृता की याद मुमकिन नहीं ।

Leave a Reply