Agar tum saath ho

उँगलियों का होना
तब तक ही वाजिब
जितना तुम्हारे हाथ का मेरे हाथों में असहज होना
और तुम्हारे जाने के बाद उस अकेले हाथ याद की तकलीफ़.

मौत क्या है
जब पीछे से तुम्हें कोई पुकारे कितने ही बार
बार-बार मिन्नतों के साथ
और तुम पलट कर यह देखना
बंद कर दो कि –
किसने पुकारा.

तुम्हारे न होने की परिधि
बॉंहों के आधे घेरे के बाहर उ होती है
जिसे कितने ही बार ठीक करने  बावजूद
स्पर्श रिसता रहता है
हरे ज़ख़्म से रक्त की तरह

 

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