इक उदास शहर का वादा

इक उदास  शहर में एक गुलाबी रात
चाँद से उतर कर जब एक किस्सा
लिखा जा रहा था सतरंगी दुपट्टे में
तो वो बेरंग शहर चमक उठा था  टिमटिमाते रंगों में
महलों से झांकती उदास खिड़कियाँ
यूँ हँस दी  थी किसी के साथ
कहते हैं लोग कि गुलाबी बिखर गया था
पलाश के पीले पत्तों सा
जैसे जूड़े में लगा दिये हों गुलाबी फूल किसी ने
कंधे पर रखे उस बेफिक्र हाथ की उस रात के बीच
कुछ शर्म से लाल हो उठा था वो किस्सा भी
आज जब पलट कर देखा मैंने इस आसमां को

इक  सपने सा वो शहर जो आँख खुलते ही धुंधला जाता हो
तो अनजान चेहरों के बीच ठहरे कितने लम्हों में
एक वादा कर रहा था वो कहानियों का शहर

रोकूंगा धूप का तेरे  सोते हुए चेहरे पर बिखर जाना
तू देखना एक दिन लुका छिपी खेलती चांदनी रात 

खटखटाएगी उन्हीं उदास खिडकियों के पाले 
हमारी कहानियों की भी तो एक  खिड़की हुआ करती थी

 

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