यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है झुमका,रिंग, हँसी,काजल,इमरोज़ के इश्क से इश्क करती है

यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है झुमका,रिंग, हँसी,काजल,इमरोज़ के इश्क से इश्क करती है

कह के जब पलटी थी वो तुमसे

कह के जब पलटी थी वो तुमसे

कि तुम नहीं हो कहीं

तो उन आँखों के बहने में तुम थे

रात के सन्नाटे में जब दिखती है उसे

तुम्हारी आवाज़

तो वो टटोलती है तुम्हारे चेहरे को

बनाती है कुछ तुम जैसा

हवा में और ढूँढती है तुम्हें

उन उकेरों में

तो जब कहा था उसने कि तुम नहीं हो कहीं

न जाना था उसने कि

किताबों के पन्नों के बीच बैठे मिलोगे तुम

या फेवरेट फिल्म के किरदारों से लगोगे तुम

तुम मुस्कुराओगे धीरे से रेडियो के हर गाने के पीछे

बस वो वाली मुस्कराहट जो कह उठती है”कहा था न मैंने”

तुम्हारा न होकर भी होगा उसके साथ

न चाहे उग आये बथुआ की तरह

बेतरतीब से पड़े उसके कपड़ों में

नीले फूलों वाले सफ़ेद कॉफ़ी मग में

एक पैर में पड़ी पायल में

हर कोने में तो छितरे पड़े हो

तो जब वो कहेगी की भूल चुकी है तुमको

और याद नहीं वो साथ का वक़्त

तो मत पूछना उससे

कि चाँद को देख कर वो क्यूँ हो जाती है उदास

क्यूँ रखा है उसने आज तक तुम्हारा वो तोहफा संभाल

क्यूँ वो पहनती है अक्सर एक झुमका जो तुमने खरीदा था

क्यूँ उसके हफ़्तों में नीला दुपट्टा लौट आता है बार बार

तो कह के जब पलटी थी वो तुमसे

कि तुम नहीं हो कहीं

सुनो

मान लेना उसे



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