दुनिया के सभी पापा के नाम

ट्रेन यात्रा के मेरे किस्सों में कल बहुत प्यारी सी कहानी जुड़ गयी. बीच सफ़र में, एक परिवार मेरी सामनी वाली सीट पर आ कर बैठा, पति, पत्नी और उनकी छोटी सी बेटी जिसका नाम पिहू था.पर सिर्फ ये तीन साथ में सफ़र कर रहे हो ऐसा नहीं था- पिहू के दो दोस्त भी थे- एक गुड़िया जिसका नाम कुहू था और एक टेडी जो गोलू था.पति की तबियत कुछ ख़राब सी थी, बुखार से परेशान थे वे. ट्रेन में चढ़ते ही सीट पर लेट गए और उनकी पत्नी ऊपर वाली बर्थ पर. अब पिहू अपने पापा के साथ ही बैठी थी. माँ ने ऊपर बुलाया पर पिहू को पापा के साथ रहना था अपने दोस्तों को लेकर. जब मान ने डांटा तो पति ने कहा “कोई दिक्कत नहीं है, रहने दीजिये यहाँ, खेल तो रही है, मैं बिलकुल परेशान नहीं हो रहा”. क्या दुनिया के सभी पापा इतने ही प्यारे होते हैं? फ्रायड वैगैरेह तो ठीक है पर क्या इसी वजह से अपने प्रेम में, अपने रिश्तों में हम पापा सी निश्चलता को खोजते हैं.

गाँव में एक बूढी चाची कहती है कि जब वो पैदा.हुआ था तो जम कर पानी बरसा था, आसमान में काले काले बादल छा गए थे, डरावने से. “लगा था कि सरजू मां सब बहा ले जाएँगी उस बरस”. पर दूसरे दिन पानी उतर गया उस डरावने दिन से आया वो पर फिर भी कितना सुकून है उसके होने से, अधखुली आँखों में डर के जब उठती हूँ तो वो ही तो है जो मुस्कुराता रहता है. वो ही है जो टूटने नहीं देता. जब अँधेरा खाने लगता है तो वो ही है जो खींच के बाहर निकाल लेता है. ये लिखते हुए जब आँखों में आसूं आ गए तो एक गहरी सांस ले कर मैं सामने देखती हूँ तो वो वहीँ खड़ा मिलता है. और मेरी लाल आँखें मुस्कुरा उठती हैं. कोने का एक दांत नहीं है उनका, आईने में खुद को देखती हूँ तो लगता है झुर्रियों के पड़ने में भी वही दिखता है, दायीं ओर ज्यादा गहराती झुर्रियां. उसका होना इस खर्च होती उम्र का एक हासिल है…………..एक दोस्त उनको बड़े पंडित कहता है और मैं पापा.

P.S.- पिहू अपने सोते हुए पापा के पेट पर ड्राइंग बुक रख कर पेंटिंग कर रही है और बगल में कुहू भी दिख रही है.सच कहूँ पिता के माथे पर परेशानी कि शिकन भी नहीं थी.

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