हम पागलों के बीच वो नंगी, अधमरी औरत नहीं रह सकती

कॉलेज से घर जा रही थी, इंटर्नशिप के समय, जब रास्ते में मुझे वो दिखी. आज भी उसके बिखरे हुए बाल, शरीर पर मांस की एक पतली लेयर और उसके चिथड़ों से कपड़े याद हैं मुझे. किसी ने दया खा कर एक शर्ट और कुछ पेटीकोट सा पहना दिया था उसे, हाईवे पर चल रही थी बेसुध, नंगे पैर, कुछ आठवाँ या नौवा महीने का गर्भ लिये. मैं वही ठिठक गयी, मैं बहुत देर तक उसे देखती रही. मैं बहुत देर तक अपने पागल नहीं होने पर शर्मिंदा होती रही.

और फिर पूरे रास्ते मुझे वो पागल याद आई, घिन सी आई हम पागलों की बस्ती के लोगों से जिन में से किसी ने उसे यह अनचाहा गर्भ दे दिया.  कुछ दिन पीछे जाते हैं. मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का स्कूल है, मैं यहाँ पढ़ाने जाती हूँ. इनमे से कुछ बच्चे मूक बधिर भी हैं और सभी प्रकार की विकलांगता को एक अम्ब्रेला में डालने से “मैनेज” करना आसान हो जाता है.  मैं यहाँ साइन लैंग्वेज सिखाती हूँ और इनसे बिना शब्दों का निश्चल प्रेम सीखती हूँ. तो ये सरासर लफ्फाज़ी है कि मैं इन्हें कुछ सिखाती हूँ.

अगस्त की एक शाम है, मूसलाधार बारिश हो रही है, दिन भर की व्यस्तता के बाद अभी अभी लौटी हूँ, चाय लेकर बैठी ही हूँ कि उसी स्कूल से एक फ़ोन आता है:

“हेलो चतुर्वेदी मैडम”

“हेलो पूजा, कैसी है आप?”

“मैं ठीक हूँ मैम, आप बताइये कैसे याद किया?”

“पूजा क्या आप यहाँ आ सकती हैं  प्लीज”

“इस एवरीथिंग ओके?”

“आप आइये मैं बताती हूँ”

मैं तुरंत ही स्कूल की ओर चल देती हूँ. वहां पहुँच के प्रिंसिपल के कमरे में जाती हूँ और वहां वार्डन को बैठे देखती हूँ. मन में एक डर सा आ जाता है,

“आइये डॉ पूजा, आप तो पूरा भीग गयी हैं, कुछ लेंगी आप चाय या कॉफ़ी ?”

“एक कप चाय लूंगी  और साथ में ये बतायें कि इतनी जल्दबाजी में कैसे बुलाया?”

“बात दरअसल ये है कि आराधना………आराधना को जानती हैं न आप? (मैं हाँ में सर हिलती हूँ), आराधना के आज महीने शुरू हुये , हॉस्टल की दोनों केयरटेकर थक गयी हैं पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, वह बार बार सेनेटरी नैपकिन निकाल कर फेंक देती है. वो आपके काफी करीब है, अगर आप उसे समझा देतीं तो …………….”

और वो रुक जाती हैं, जानती हूँ यह आग्रह भर नहीं है, ये एक भरोसा  है जो मैं तोड़ नहीं सकती .

मैं हॉस्टल की ओर बढती हूँ, आराधना अपने कमरे में गुमसुम बैठी है, मुझे देखते ही चहक उठती है. यहाँ मैं बता दूँ कि आराधना लो IQ वाली मूक बधिर लड़की है. मैं आराधना को लेकर गार्डन की तरफ जाती हूँ और हम दोनों एक चबूतरे के नीचे जाकर बैठते हैं.

मुझे माँ की याद आती है जिसने सर पर हाथ फेरते हुये हमें पहली बार महीने/पीरियड्स के बारे में सब समझाया था और आज मुझे ऐसा ही कुछ करना था. मैं आराधना को समझाती हूँ और उसके चौथे- पांचवे बार सेनेटरी नैपकिन को फेंक देने के बाद से किसी तरह ये समझाने में सफल रहती हूँ कि सेनेटरी नैपकिन कितना ज़रूरी है उसके लिये , अब आराधना शांत हो गयी है, वह चीखती नहीं, चिल्लाती नहीं मुझ पर बस सर टिका के बैठ जाती है पर मेरे मन में मचा है एक तूफ़ान, एक तूफ़ान जो शिकायत है मेरी तुम्हारे भगवान, अल्लाह, इशु और वाहे गुरु से.

मुझे शिकायत है हर उस चीज़ से जिसे हम पूजते है, जिसे प्रसाद और कुछ चढ़ावे का रिश्वत दे सब अपनी अर्जियां उसके पास पहुंचाते हैं, पर मुझे एक जेन्युइन शिकायत है उससे- अगर तुमने अराधना जैसी  कितने लडकियों को कुछ भी नार्मल नहीं दिया तो ये हर महीने का सरदर्द क्यूँ ? जब तुमने उन्हें मेंटली एक्टिव नहीं बनाया तो सेक्सुअली एक्टिव क्यूँ? और सेक्सुअली एक्टिव बनाकर तुमने छोड़ दिया उन्हें असुरक्षित हम पागलों  की एक ऐसी दुनिया में जहाँ कितने लोग घात लगायें बैठे हैं. उन्हें किसी  के छूने पर कोई सरसराहट तो होती नहीं  होगी न ही कोई शारीरिक आकर्षण. और यह सिर्फ लड़कियों के साथ नहीं है. कितने ही लड़के चाइल्ड केयर होम्स से चाइल्ड एब्यूज का शिकार होते हैं.

जब पहली बार लोकल ट्रेन में एक पागल औरत को लेबर पेन  होते देखा था तब घिन आई थी ये सोचकर इनका रेप करने से किसी को क्या प्लेज़र मिलता होगा. पर फिर ध्यान आता है कि कितना रिस्क फ्री होगा इन औरतों का रेप करना, ये थाने नहीं जाती, ये FIR नहीं करवाती, कोई कैंडल लाइट मार्च नहीं, कोई पोलिटिकल इस्श्यु नहीं, कोई महिला कमीशन नहीं. इनके प्रति तो किसी की भी कोई जिम्मेदारी नहीं होती. बस हम सो कॉल्ड सभ्य समाज के लोग जो पागल नहीं हैं इन्हें ऐसा देख कर दुखी होते हैं, उन दरिंदों को चार गाली देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं.

अब आराधना को नींद आ गयी है, वह सो रही है और मैं उसके बालों में उंगलियाँ फेर रही हूँ. चाहती हूँ कि वो सुरक्षित रहे इन चार दीवारों के पीछे, बाहर की दुनिया बड़ी क्रूर है – नीचे कुछ भेड़ीयें घूम रहे हैं और ऊपर वाले ने न जाने क्या सोच के तुमको सेक्सुअली एक्टिव बना दिया.

मुझे तुम्हारी फ़िक्र होती है अरु क्यूंकि मेरी नज़रों से वो नंगी, पागल औरत नहीं जाती एक पल के लिये भी.

5 Comment

  1. You made me in tears … so cruel but truth of society

    1. Dr. Pooja Tripathi says: Reply

      Thanks a lot Ruchi

    1. Dr. Pooja Tripathi says: Reply

      Thank You Kalaa shree

  2. Ye marmik ktaksh netron ko bheegane ke liye paryapt hai!
    apne samajik dasha ko bhut achhe se pesh kia hai

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