यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है झुमका,रिंग, हँसी,काजल,इमरोज़ के इश्क से इश्क करती है

यादों की निर्जन बस्ती में,पोटली लिए फिरा करती है झुमका,रिंग, हँसी,काजल,इमरोज़ के इश्क से इश्क करती है

एक बंद खिड़की जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं

एक बंद खिड़की

जिसके इस पार खड़ी हूँ मैं

खटखटाती हूँ पुरानी लकड़ी के पाले

बाहर की तेज़ बारिश के शोर में

गुम हो जाती है ये आवाजें

कुछ खटखटाहट

थोड़ी सिसकियाँ

बंद किवाड़ों के पीछे

सीलन भरी दीवारों से लगे

बैठी है कोई पुरानी कहानी

एक वक़्त के किस्से पुराने पर्दों

से टंगे पड़े हैं किसी कोने में

जानती हूँ बह रही है आवाज़

पहुँचने से पहले तोड़ देती है दम

पूछ रही हूँ फिर भी

कोई है? क्या कोई है अन्दर ?

 



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