हमारी नफरतों के बीच एक माँ

एक अजीब से घिनौने समय में हम जी रहे हैं, जहाँ एक होड़ मची हुई है कि “तेरी वाली देशभक्ति, मेरी वाली देशभक्ति“ से कम कैसे. मुझे गुरमेहर की भी बात बचकानी लगती है और उसे जवाब देने वाले सो कॉल्ड देशभक्तों पर तो तरस आता है जो अपनी बात रखने के लिये पहले दलील देते हैं और जब दलील चुक जाती है तो रेप की धमकी देते हैं.

इस सारे तमाशे के बीच मैं कुछ समय पीछे जाती हूँ. वॉर हीरोज पर एक डाक्यूमेंट्री बना रही हूँ, प्रोफेसर एस.के नैयर से उनके घर पर मिलती हूँ. उनसे लम्बी बातचीत करती हूँ कैप्टन अनुज नैयर, महावीर चक्र के बारे में. ढेर सारे किस्से और तस्वीरें. 24 साल के बेटे को जंग में खो चुकी एक माँ बाहर निकलती हैं जो आधी मुस्कान के साथ मेरे नमस्ते का जवाब देती हैं. मुझे पहले ही प्रोफेसर नैयर बता चुके हैं कि अपने बेटे के शहादत के बाद उन्हें जितनी तकलीफों का सामना करना पड़ा, उसके बाद अनुज की माँ किसी से भी बात नहीं करती.

एक जोड़ी पथराई आँखें, वो आँखें आज भी मेरा पीछा करती हैं. जब आप ये देशभक्ति का नाच करते हैं तो मुझे सिर्फ Mrs नैयर की दो पथरायी आँखें दिखाई देती है. जंग में चली गोली से एक सैनिक शहीद होता है, और हमारी उदासीनता से एक परिवार ख़त्म हो जाता है. हम सिर्फ शोर मचाते हैं, आज देशभक्ति पर, कल सलमान की शादी पर और परसों किसी और मुद्दे पर. हमे सिर्फ कहना है, सुनना नहीं है. और जो हमारी बात नहीं सुनेगा उस पर हम चिल्लायेंगे, गाली देंगे, मारेंगे और रेप जैसा हथियार तो है ही, हर जगह काम आ ही जाता है.

जब ये नंगा नाच ख़त्म हो जाये और इस बात पर निर्णय हो जाये की कौन सही है और कौन गलत तो याद रखना कि कारगिल युद्ध ख़त्म होने के 18 साल बाद भी एक माँ को ना तुम्हारी fanatic देशभक्ति से कोई मतलब है और ना तुम्हारी ट्रिपल सेंचुरी से, उसे आज तक यही बात सालती है कि शहादत के दिन उसका बेटा बिना कुछ खाये ही जंग में चला गया.

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