सब कहते हैं कि तुम यहाँ नहीं हो

चलती हूँ एक अर्धनिद्रा में
टटोलती हूँ तुम्हारे चेहरे को
बनाती हूँ कुछ तुम जैसा
हवा में
और ढूँढती हूँ तुम्हें
उस चेहरे में
दिखता है तुम्हारा अक्स
तारों की तरह
दूर तक फैले
टिमटिमाते हुए
पर रोशनी नहीं
और जब कुहासा छाये
छिप जाते हैं
अंधेरे की चादर ओढ़े
उस अघड़ तस्वीर में
टाँक देती हूँ तुम्हारी वो
आधी मुस्कुराहट
जिसके पीछे दुबक के
बैठा होता है लाड़
मुझे इशारा करते हुये
चुप रहने का, कम हँसने का
तुम्हारी बेमतलब की झिड़की
सर्दी के धूप सरीखी
सुनहरी, मुलायम
इतराते हुए जो आँगन में आये
कुछ हड़बड़ी में
वापस जाने को परेशान
एक अकेली कुर्सी पर
जब एक अकेली चाय पीते
सुबह की अंगड़ाई में
देखती हूँ
उसी धूप के टुकड़े
को हर मौसम
बिल्कुल वैसा
तुम्हारा न होकर भी यहाँ होना
न चाहे उग आये बथुआ की तरह
फर्श पर बिखरे हुये
बाल्कनी पर पड़ी टूटी कुर्सी पर
बैंगनी रंग के फूलों वाली चादर पर
एक बड़े से कॉफी मग में
आईने के किनारे लगी लाल बिंदी में
हर कोने में तो छितरे पड़े हो
और सब कहते हैं कि तुम
यहाँ नहीं हो
I am writing this for the blogchatter prompt “Without You” in Hindi.

5 Comment

  1. Awesome! your expressions flow like a smooth flow of river.

  2. I am at a loss for words. Interesting, deep, intense …all fall short to describe the magic in your words.

  3. Each and every line of this poem touched me …you are genius dear
    I reading reading your poems after Gulzar

    1. Dr. Pooja Tripathi says: Reply

      That’s a huge compliment Dixu

  4. wow this poem is amazing

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