ये चाय की पत्तियाँ बिलकुल मेरे पापा सी

fb_img_1472647228835“ठिठुरती सी सुबह में
अलसायी आँखों को खोलने की कोशिश
चाय बनाने को उठी मैं
दुधीले सफ़ेद को
सुनहरा करती ये चाय की पत्तियां
लगी मुझे कुछ पहचानी सी
रंगों को भरते
सबमें मिलकर ,सबसे मिलकर
कुछ नया गढ़ते
और फिर भी खुद सा ही रहते
ये चाय की पत्तियाँ
लगी मुझे कुछ जानी पहचानी सी
लगी मुझे मेरे पापा सी
जिनके बिना रंग भी ठहरे हैं
और ज़िन्दगी का जायका भी
ये चाय की पत्तियाँ
बिलकुल मेरे पापा सी”

 

This post is written for Blogchatter’s prompt for the week – INTERNATIONAL TEA DAY

2 Comment

  1. I wish to read more of this poem…
    I enjoyed the beautiful lines you wrote ☺

    1. Thank You Love.
      i will write a poem on dad’s bday on 1st.
      will send it to you.
      hugs

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