पर मुहब्बत तो हमने भी तुमसे कम नहीं की है

मेरी अमृता

अमृता प्रीतम ………… एक इश्क सा है तुमसे जब से समझा कि जादू तो शब्दों का होता है, जबसे जाना कि हर वो शख्स मुझे इंस्पायर करता है जो डरता नहीं, डरता नहीं व्यक्त करने में, डरता नहीं जीने में, डरता नहीं टूट कर इश्क करने में. सबने तुम्हें साहिर और इमरोज़ के खांचों में डाल कर देखा पर तुम कुछ और थी, तुम उस हिम्मत का नाम थी जिसे साड़ी में लपेट कर छुपा दिया जाता है, जिसे “का” और  “की” के फेर में मार दिया जाता है,तुम कविता लिखती नहीं, कविता को जीती थी. आज जब देखती हूँ कि स्त्री लेखकों पर व्यक्तिगत कटाक्ष फेलो लेखकों से ही आते हैं तो क्या रसीदी टिकट भेजना बच कर लिखने वालों को “फ़क ऑफ ” कहने जैसा नहीं था.  यह  सिर्फ तुम ही कह सकती थी कि

” तुम किसी से रास्ता न मांगना 
   और किसी भी दिवार को 
    हाथ न लगाना 
    न ही घबराना 
    न किसी के बहलावे में आना 
    बादलों की भीड़ में से 
    तुम पवन की तरह गुजर जाना.”

जब भी तुम्हें पढ़ा कुछ पिघलता है अन्दर, बूँद बूँद रिसता है, कुछ टूटता है जिसे अगर तुम भी सामने होती तो नहीं बता पाती. अगर तुमसे कहना हो तो यही कहूँगी

“यह आग की बात है
तूने यह बात सुनाई है
यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है
जो तूने कभी सुलगाई थी

चिंगारी तूने दे थी
यह दिल सदा जलता रहा
वक़्त कलम पकड़ कर
कोई हिसाब लिखता रहा”

अधूरी ख्वाहिशों के फेहरिस्त में एक सबसे बड़ी टीस है – तुमसे न मिल पाना. तुमसे कहने की कोशिश करना कि तुम क्या हो मेरे लिखने में, तुम कहाँ हो मेरे होने में पर मैं जानती हूँ कि ये सिर्फ सोचने भर में एक शेप लेता है,असल में गर तुमसे मिलती तो शब्द गले में ही दुबककर बैठ जाते,निकलने से इनकार कर देते.

“ यूँ तो जहाँ में मशहूर है इमरोज़ का फ़साना

  पर मुहब्बत तो हमने भी तुमसे कम नहीं की है “

जन्मदिन मुबारक मेरी अमृता.

ek-mulaqaat-amrita

4 Comment

  1. यह देख कर आज भी अच्छा लगता है कि “आज भी कलमें “किसी के जीवन की दिशा बदल देती हैं। निर्भीक, स्वतंत्र, सशक्त। नमन। जीवन।

    1. शुक्रिया श्रेयांश

  2. पूजा जी जिस बेहतरीन तरीके से आपने लिखा है, पढ़ कर लगता है आप एक बेहद उम्दा इंसान है…

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित
    जयपुर से “महेंद्र”

  3. Beautiful peace of writing

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