तुलसी का पौधा

वह हर रोज़ नींद से हड़बड़ा कर उठा जाती, बुरे सपने उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहे थे. रोज़ अधूरी सी नींद के बाद सुबह उठती तो थकी हुई, चिढ़ी हुई. सपने में सब कुछ भरभराकर गिर जाता और वो उसे थाम नहीं पाती थी.

” बहुत ख़राब सपने आते हैं यार, परेशान हो गयी हूँ.”

“एक काम करो, तुलसी का पौधा लगा लो घर में. बुरे सपने नहीं आयेंगे और डर भी नहीं लगेगा”

” मतलब कुछ भी, साइंस के ज़माने में, एक तरफ हमने गॉड पार्टिकल की खोज कर ली है और दूसरी तरफ ये तुलसी के पौधे की थ्योरी. उफ़! मैं अथिस्ट हूँ, नास्तिक ये तुलसी वाली बात कम से कम मुझसे तो न कहो”.

फिर एक दिन उसे किसी ने तुलसी का पौधा दिया, उसे उन  ख़राब सपनों की बात याद हो आई, वह हँसी और तुलसी को घर लाकर भूल गयी.

साल की एक ऐसी  सुबह जब वक़्त पिछली  रात का हाथ छोड़ने ही वाला  था  तो एक कॉल आया.

किसी अपने की तबियत ख़राब थी, फ़ोन के दूसरी ओर वह कह रही थी कि सब ठीक हो जायेगा और फ़ोन के इस तरफ आंसुओं से बना एक डर बड़ा हो रहा था धीरे धीरे.

रात में बहुत देर तक वो करवट बदलती रही, नींद आँखों से गायब थी.अब तक डर काफी बड़ा हो चुका था और सामने खड़ा उसे घूर रहा था.

वह उठी और बालकनी की लाइट जलायी. बालकनी की लाइट शायद फ्यूज हो चुकी थी, मोबाइल की रौशनी में वह कुछ ढूँढने लगी चारों तरफ.

“थैंक गॉड, मिल गया”

वही तुलसी का पौधा पड़ा था एक कोने में, मिटटी सूख कर झड़ रही थी आस पास.उसने तुलसी के पौधे से मिटटी झाड़ी, और उसमें थोड़ा थोड़ा पानी डालती रही धीरे धीरे , पूरी तरह वो नहीं सूखा था.दो छोटे पत्ते अभी तक हरे थे.

तुलसी के पौधे पर पानी डाल के, उसे ध्यान से रखकर वो वापस आई. डर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था.

 

 

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