हम सब में दरार है जो दिखती नहीं 2: सिर्फ ब्रेकअप से डिप्रेशन नहीं होता

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दरार जो बताता है कि कुछ टूट गया है, कुछ दरक गया है, शायद आर पार नहीं, कोई टुकड़ा नहीं पर दरार बताती है कि कुछ टूटा जरुर है. कुछ पिघल गया है अन्दर मोम की तरह जो चाह कर भी वैसा नहीं हो पा रहा जैसा पहले था. पर जरुरत भी क्या है पहले जैसे होने की, हम कोई नया, कोई सुन्दर ढांचा भी तो ले सकते हैं ….आखिर जीना इसी का नाम है.

मैं मिलती हूँ एक ऐसी लड़की से जिसने अपना काम छोड़ दिया और घर आकर रहने लगी है . एक ऐसा काम जिसे हम सब सफलता के और आगे बढ़ने के पैमाने मानते हैं. मैं पूछती हूँ क्यूँ, वो कहती है “डिप्रेशन में है”. मैं  पूछने की जरुरत नहीं समझती, अपने आप ये मान बैठती हूँ कि कोई ब्रेकअप या दिल टूटने का चक्कर होगा. मैं एक डॉक्टर होकर भी ये ऑटो मोड में मान बैठती हूँ. पता चलता है कि ऐसा कुछ नहीं था. सब सही जा रहा था- एक अच्छी खासी सैलरी बैंक में आ रही थी, एक फ्लैट था पास में, पासपोर्ट पर स्टाम्प लग रहे थे, वीकेंड भी मजेदार होता था , डेटिंग भी हो रही थी ……फिर ये डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ का किसी के पास कोई जवाब नहीं. बस यूँ ही मन उचट जाता है हर उस चीज़ से जिसे हम एक माइलस्टोन की तरह देखते हैं, हमारी बकेट लिस्ट में शायद टिक लगते रहे पर हम उतने ही उदास भी हो सकते हैं. ये बेवजह, बेमतलब और बेहद उदास करने वाला होता है. ये डिप्रेशन होता है. डिप्रेशन सच में एक दरार की तरह है जिसे न थामा गया तो सब कुछ ढह जाता है, देखते देखते हमारे सामने. और हम वही एक प्रश्न के साथ पीछे रह जाते हैं- पर डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ के पीछे क्यूँ भागना. क्या सच में अगर हमें क्यूँ मिल भी जाए तो क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा? नहीं……कभी नहीं. अवसाद या डिप्रेशन किसी भी क्यूँ, क्या, कैसे और कहाँ से ऊपर उठ चुका होता है. मैं अपनी उस नयी सहेली को अपने बचपन का किस्सा सुनाती हूँ जब मैं एक मेले में खो गयी थी और सिर्फ इसीलिए “खोया पाया सेण्टर” में आये अपने माँ पापा को पहचानने से इनकार कर दिया था क्यूंकि उस सेंटर में मुझे सेब खाने को दिया गया था और मुझे डर था कि अगर मैंने माँ पापा को पहचाना तो वो सेब वापस ले लिया जायेगा.

वह जोर से हंसती है, इतने जोर से कि उसकी आँखों में आँसूं आ जाते हैं. तो बस अपने डिप्रेस्ड दोस्त, भाई, बहिन, किसी जाने पहचाने वाले को इतने जोर से हंसाओ कि आँसूं आ जाये. आओ सड़े हुये जोक्स मारें, आओ बेवकूफियां करें, आओ हम भूल जायें कि हम बड़े हैं और बिना किसी कारण के, बिना किसी मतलब के बस ठहाके मार के हँसे और उन्हें वापस ले आयें. आप जानते हैं कि मैंने आंसूं लाने की बात क्यूँ की ? आँसू दिखाता है कि जो जम गया है वो पिघल रहा है और जब तक वो पिघलेगा नहीं हम उससे कुछ नया, कुछ सुन्दर कैसे बनायेंगे.

दवाओं को अपना काम करने दीजिये बस दोस्ती की, इंसान होने के पंख लगा दीजिये. फिर देखिये कौन  सा डिप्रेशन, कैसा डिप्रेशन. हमें समझना होगा, हमें समझाना होगा, हमें साथ देना होगा हर उस शख्स से जो लड़ रहा है ये लड़ाई, इस लड़ाई में इंसान बीमारी से बाद में हारता है किसी के न परवाह करने से, अपनों की उदासीनता से पहले हार जाता है. आप जिनसे प्यार करते हैं, जो आपकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं, उनका हाथ पकड़िये, उन्हें बिना किसी जजमेंट के सुनिये, उनकी जगह खुद को रखिये, उनकी उदासी के पीछे छिपे एक खूबसूरत चेहरे से उन्हें फिर से मिलाइये क्यूंकि सच तो ये है कि……

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं.

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