तुम फिर कोई कविता क्यूँ नहीं लिखते

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Photo Courtesy- Etsy.com

कल तुम्हारा ख़त मिला और तुमने लिखा कि

कबाड़खाने में जब टूटा ब्रश मिला  है,

और फटा कैनवास,

और सूखे रंगों की शीशियां…

मैंने देखा उन्हें आँखों के सामने

मुंह चिढ़ाते तुम्हें

भभक कर जलते

जैसे चिनार के दहकते रंग

तस्वीरों से अलग एक दुनिया है

जहाँ ज़मीनी झोंके हमें उखाड़ने की कोशिश में है

एक कविता हुआ करती थी तुम्हारी अघड़  पेंटिंग जैसी

एक पेंटिंग हुआ करती थी तुम्हारी अधूरी कविता जैसी

वे रंग सूख गये, और शब्द इशारा करते हैं चुप रहने का

शशश…………

कभी सुना था एक फ़कीर से किसी भूले हुये गीत में

कि प्रेम पतझड़ के गिरे पत्तों सा है

एक लम्बी बर्फीली रात गुजर चुकी है

तुम गुनगुनाते हो अकेले में

संध्यादीप सा खूबसूरत

पेंसिल लेकर बंनाते हो कोई बेमतलब सा स्केच

बस रंग भर दो उनमें

भले वो मिल जाये एक दुसरे से और लगे बेतरतीब

क्यूंकि पेंटिंग का कोई चेहरा नहीं होता

और न ही कविता की कोई शक्ल

दो आँखें भर होती हैं उनकी

तो उस कबाड़ख़ाने में पड़े उस टूटे टूथब्रश को देखो

वो पतझड़ के टूटे पत्तों सा है

एक नया पत्ता जो दिखा है कल ही

वो पूछ रहा है तुमसे

तुम फिर से पेंटिंग क्यूँ नहीं करते

तुम फिर कोई कविता क्यूँ नहीं लिखते

 

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