The Paper Boat

We strive to give it a shape
Of a boat
A paper boat
Ready to sail
Against the winds
In the rhythm of flow
Swaying and smiling

Just like life
Folding todays
Shaping tomorrows
Tearing yesterdays
Ignoring the rough edges
And there it goes
In a stretch of emotions
Towards the vastness called relations
Silently observing from a distance
As it sways and smiles
Sigh! We gasp!
It is not that smoother
We could have made it better

1

हम सब में दरार है जो दिखती नहीं 2: सिर्फ ब्रेकअप से डिप्रेशन नहीं होता

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दरार जो बताता है कि कुछ टूट गया है, कुछ दरक गया है, शायद आर पार नहीं, कोई टुकड़ा नहीं पर दरार बताती है कि कुछ टूटा जरुर है. कुछ पिघल गया है अन्दर मोम की तरह जो चाह कर भी वैसा नहीं हो पा रहा जैसा पहले था. पर जरुरत भी क्या है पहले जैसे होने की, हम कोई नया, कोई सुन्दर ढांचा भी तो ले सकते हैं ….आखिर जीना इसी का नाम है.

मैं मिलती हूँ एक ऐसी लड़की से जिसने अपना काम छोड़ दिया और घर आकर रहने लगी है . एक ऐसा काम जिसे हम सब सफलता के और आगे बढ़ने के पैमाने मानते हैं. मैं पूछती हूँ क्यूँ, वो कहती है “डिप्रेशन में है”. मैं  पूछने की जरुरत नहीं समझती, अपने आप ये मान बैठती हूँ कि कोई ब्रेकअप या दिल टूटने का चक्कर होगा. मैं एक डॉक्टर होकर भी ये ऑटो मोड में मान बैठती हूँ. पता चलता है कि ऐसा कुछ नहीं था. सब सही जा रहा था- एक अच्छी खासी सैलरी बैंक में आ रही थी, एक फ्लैट था पास में, पासपोर्ट पर स्टाम्प लग रहे थे, वीकेंड भी मजेदार होता था , डेटिंग भी हो रही थी ……फिर ये डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ का किसी के पास कोई जवाब नहीं. बस यूँ ही मन उचट जाता है हर उस चीज़ से जिसे हम एक माइलस्टोन की तरह देखते हैं, हमारी बकेट लिस्ट में शायद टिक लगते रहे पर हम उतने ही उदास भी हो सकते हैं. ये बेवजह, बेमतलब और बेहद उदास करने वाला होता है. ये डिप्रेशन होता है. डिप्रेशन सच में एक दरार की तरह है जिसे न थामा गया तो सब कुछ ढह जाता है, देखते देखते हमारे सामने. और हम वही एक प्रश्न के साथ पीछे रह जाते हैं- पर डिप्रेशन क्यूँ?

इस क्यूँ के पीछे क्यूँ भागना. क्या सच में अगर हमें क्यूँ मिल भी जाए तो क्या सब कुछ ठीक हो जायेगा? नहीं……कभी नहीं. अवसाद या डिप्रेशन किसी भी क्यूँ, क्या, कैसे और कहाँ से ऊपर उठ चुका होता है. मैं अपनी उस नयी सहेली को अपने बचपन का किस्सा सुनाती हूँ जब मैं एक मेले में खो गयी थी और सिर्फ इसीलिए “खोया पाया सेण्टर” में आये अपने माँ पापा को पहचानने से इनकार कर दिया था क्यूंकि उस सेंटर में मुझे सेब खाने को दिया गया था और मुझे डर था कि अगर मैंने माँ पापा को पहचाना तो वो सेब वापस ले लिया जायेगा.

वह जोर से हंसती है, इतने जोर से कि उसकी आँखों में आँसूं आ जाते हैं. तो बस अपने डिप्रेस्ड दोस्त, भाई, बहिन, किसी जाने पहचाने वाले को इतने जोर से हंसाओ कि आँसूं आ जाये. आओ सड़े हुये जोक्स मारें, आओ बेवकूफियां करें, आओ हम भूल जायें कि हम बड़े हैं और बिना किसी कारण के, बिना किसी मतलब के बस ठहाके मार के हँसे और उन्हें वापस ले आयें. आप जानते हैं कि मैंने आंसूं लाने की बात क्यूँ की ? आँसू दिखाता है कि जो जम गया है वो पिघल रहा है और जब तक वो पिघलेगा नहीं हम उससे कुछ नया, कुछ सुन्दर कैसे बनायेंगे.

दवाओं को अपना काम करने दीजिये बस दोस्ती की, इंसान होने के पंख लगा दीजिये. फिर देखिये कौन  सा डिप्रेशन, कैसा डिप्रेशन. हमें समझना होगा, हमें समझाना होगा, हमें साथ देना होगा हर उस शख्स से जो लड़ रहा है ये लड़ाई, इस लड़ाई में इंसान बीमारी से बाद में हारता है किसी के न परवाह करने से, अपनों की उदासीनता से पहले हार जाता है. आप जिनसे प्यार करते हैं, जो आपकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं, उनका हाथ पकड़िये, उन्हें बिना किसी जजमेंट के सुनिये, उनकी जगह खुद को रखिये, उनकी उदासी के पीछे छिपे एक खूबसूरत चेहरे से उन्हें फिर से मिलाइये क्यूंकि सच तो ये है कि……

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं.

मेंटल इलनेस के ब्लॉग पोस्ट्स के पहले हिस्से के लिये क्लिक करें :

 

 

 

 

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं

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Courtesy:Andrew Mclachlan Photography

कुछ दिन पहले पोएट्री के  एक इवेंट में गयी थी .यहाँ 15 लोग आये थे, 15 अजनबी जो एक दूसरे को बिलकुल भी नहीं जानते थे, 15 कहानियाँ, 15 कवितायेँ, 15 मन  और सैंकड़ों दरारें. साथ में रहते, एक दूसरे को अपनी ज़िन्दगी में आने का, झाँकने का न्योता देते वे 15 लोग एक दूसरे को बिल्कुल नहीं जज कर रहे थे. समझने की कोशिश कर रहे थे, सहारा देने की कोशिश, 14 जोड़ी आँखें जो हर किसी को कह रही थी “सब ठीक हो जायेगा”.

हमने बातें की, लम्बी बातें और मैंने जाना कि ख़ुशी कितनी सब्जेक्टिव चीज़ होती है. हम फासलों के बीच तैरते हैं, फैसलों पर रुकते हैं ,एक ख़ुशी का दौर तो एक तकलीफ की लहर और इन्हीं सब के बीच हम ज़िन्दगी नाम की किताब के क्लाइमेक्स में पहुँच जाते हैं. हम सभी 18-30 की उम्र के थे. हमने बातें की अपनी कमजोरियों के बारे में, अपने डर के बारे में, अपनी गलतियों के बारे में, अपने सपनों के बारे में और अपने अपनों के बारे में.

मैंने जाना कि हर dysfunctional family, हर टूटते हुये रिश्ते, हर विश्वास की दरें लांघता कोई टच,  हर ऊँची आवाज़ और हर दबी हुई सिसकी के निशान होते हैं, निशान जो पीछे छोड़ जाते हैं मानसिक बीमारी के रूप में. मेंटल इलनेस सिर्फ पागलपन नहीं होता, यह बस यूँ ही रुलाई फूट जाने वाले डिप्रेशन से शुरू होकर मैनियाक तक पहुँच सकता है.

मैं एक दोस्त से मिलती हूँ, चुप रहता है पर कवितायेँ इंटेंस हैं, ऐसी कविता जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जायें पर इस चुप्पी के पीछे कुछ है, ये वो सन्नाटा है जो चाहा  नहीं है, ये वो सन्नाटा है जो लड़ रहा है आपसे भीतर ही भीतर .पता चलता है कि वो बाइपोलर डिसऑर्डर से लड़ रहा है. यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, जिसमे मन लगातार कई हफ़्तो तक या महिनों तक या तो बहुत उदास या फ़िर अत्यधिक खुश रहता है | उदासी में नकारात्मक तथा मैनिया में मन में ऊँचे ऊँचे विचार आते हैं | और मैनिया के एक ऐसे ही एपिसोड में उसने अपने साथ साथ 4 और लोगों की ज़िन्दगी को जोखिम में दाल दिया. उस दिन इसने सोचा कि मेडिकल हेल्प लेगा और तब से दवा ले रहा है. मैं उसे कहती हूँ कि इस बारे में  बात करने के कारण मैं बहुत इज्ज़त करती हूँ उसकी और वो जब चाहे मुझसे बात कर सकता है.

मिलती हूँ एक ऐसी लड़की से जो चाइल्ड एब्यूज के जख्म को अब तक पाले हुये है. उस बारे में बात करते उसके आँखों में डर तैर जाता है, हडबडाहट  दिखने लगती है, वो आँखें नहीं मिलाती, वो बात करते हुये भी बात पलट देना चाहती है. वो स्ट्रोंग सी दिखती लड़की जो डरी सहमी उस छोटी लड़की को बुलाती है, उसे गले लगाना चाहती है पर ठिठक जाती है और बस देखती है उस बच्ची को सुबकते. मैं उसे गले लगाते हुये कहती हूँ कि हम सबके सफ़र में कुछ अँधेरे हैं पर उनसे डरना नहीं है. वह मुस्कुराती है, कोर पर एक आँसू टिक गया है और उस आँसूं के रिफ्लेकशन.में मुझे वो बच्ची दिखाई देती है

ये जो आसान ज़िन्दगी दिखती है न बाहर से, ये किसी की आसान नहीं है. एक भीड़ में भी तनहा आदमी , अधूरी ख्वाहिशें की खुरचन में जीती वो औरत, किसी की उम्मीदों का बोझ ढोते एक लड़का, एक परफेक्ट से सांचे में खुद को घुसाते एक लड़की, बचपन में किसी शैतान के चंगुल में फंसना या किसी फ़रिश्ते का हाथ सर से उठ जाना या फिर बिना किसी वजह बस उदासी का पैठ जाना………..कितना कुछ तो तैयार करता है मेंटल इलनेस के लिये ज़मीन.

हमें समझना होगा, हमें समझाना होगा, हमें साथ देना होगा हर उस शख्स से जो लड़ रहा है ये लड़ाई, इस लड़ाई में इंसान बीमारी से बाद में हारता है किसी के न परवाह करने से, अपनों की उदासीनता से पहले हार जाता है. आप जिनसे प्यार करते हैं, जो आपकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं, उनका हाथ पकड़िये, उन्हें बिना किसी जजमेंट के सुनिये, उनकी जगह खुद को रखिये, उनकी उदासी के पीछे छिपे एक खूबसूरत चेहरे से उन्हें फिर से मिलाइये क्यूंकि सच तो ये है कि……

हम सब में दरार है, जो दिखती नहीं.

 

#DearZindagi……Will you date me?

Dear Zindagi

I want to talk to you after a losing a closed one unexpectedly.

Some time back, my phone rang at 4 am in the morning, I am not a morning person so I didn’t wake up.But the ringing never stopped.

My cousin brother’s name flashed.

I was scared, my pessimistic mind took over and the hour of the day signaled bad news.

My chacha ji (Uncle) had passed away.

He was in his fifties.

He was healthy.

He was hearty.

He passed away due to cardiac arrest.

On the other end was a crying son and what was I supposed to say to him: Don’t cry (He should let the pain vent out), Everything will be okay (I knew I would be lying), We are in this together ( In sorrows like this, everyone is a loner, battling alone).

I didn’t say a word.

I could not say a word.

He has gone, never to come back.

Knowing fully well that death is the only thing that will surely happen with us all, we are never ever prepared for it. My chacha belonged to the millions of Indians who spent a major part of life in foreign countries doing a blue collared job sending back money to their family, remittances to their country and surviving out of meager in the place of their work.

They make plans, plans to have their own house, to wed off their sons and daughters, buy a land back in India and retire. And who does not makes plans, We all do, knowing fully well one single thing at that moment- We don’t know what’s gonna happen the very next moment.

Remembering of plans, I too made some

Two Months Before-

In a small diary that I write I had a well thought of story for my novel, novel based on the people like my Chacha, their lives in the foreign lands, their loneliness, their struggle, their songs, their longings and Chacha ji was my only source. I made plans and plans but alas the plans always came with a later tag. Sometimes career stared in my blank face, sometimes nothing came up but I never planned to execute my plan of going to my paternal village, making my chachaji speak and taking notes.

The evening when I finally decided that this is the best time to relocate to my village turned out to be worst time.

He passed away the next morning.

A Day Later

I was looking for solace, for words of support. I had thought that in a tragedy as big as this everything will come to a stand still. People won’t smile, they won’t breathe.

Did it actually happen? No?

Death- the single largest truth that never ceases to snatch away any of our plans.

We fail to realize the most unsettling truth in this  mad rush to settle down. The whole propaganda of settling down breeds survival of the fittest or to better sum up elimination of the weaker.

But can we ever call ourselves fittest, think twice.

Can we ? We will always be weak in one or the other departments.

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Image Courtesy- mensxp.com

Dear Zindagi i have learnt that we should enjoy you, cherish you and value you in whatever bits and pieces we get to have you. Death never leaves us any time to mend a mistake, to undo a wrong, to say the unsaid, to cry over a failed exam, to curse over a relationship gone wrong, to even say a goodbye.

So Dear Zindagi, i want to have you by my side, smiling and swirling and then i wish to scream what is my learning from losing a closed one:

Mend your mistakes, if you can’t just apologize.

Say the unspoken, Silence is what death is like: Brutal and mysterious.

Smile over your failures too.

Move out of a relationship gone wrong.

Say “I love You” to the people who care.

Go on a holiday because holidays make memories and memories support the ones left back.

Don’t equate money with life, money with care and money with family (Believe me, if it was possible my dad would have traded all of his life’s earnings for his younger brother).

Date life because like it or not you have to marry death one day.

Dear Zindagi- I love you yaar……….Behad.

“I am writing a letter to life for the #DearZindagi activity at BlogAdda”

Dear Zindagi teaser Video

तुम फिर कोई कविता क्यूँ नहीं लिखते

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Photo Courtesy- Etsy.com

कल तुम्हारा ख़त मिला और तुमने लिखा कि

कबाड़खाने में जब टूटा ब्रश मिला  है,

और फटा कैनवास,

और सूखे रंगों की शीशियां…

मैंने देखा उन्हें आँखों के सामने

मुंह चिढ़ाते तुम्हें

भभक कर जलते

जैसे चिनार के दहकते रंग

तस्वीरों से अलग एक दुनिया है

जहाँ ज़मीनी झोंके हमें उखाड़ने की कोशिश में है

एक कविता हुआ करती थी तुम्हारी अघड़  पेंटिंग जैसी

एक पेंटिंग हुआ करती थी तुम्हारी अधूरी कविता जैसी

वे रंग सूख गये, और शब्द इशारा करते हैं चुप रहने का

शशश…………

कभी सुना था एक फ़कीर से किसी भूले हुये गीत में

कि प्रेम पतझड़ के गिरे पत्तों सा है

एक लम्बी बर्फीली रात गुजर चुकी है

तुम गुनगुनाते हो अकेले में

संध्यादीप सा खूबसूरत

पेंसिल लेकर बंनाते हो कोई बेमतलब सा स्केच

बस रंग भर दो उनमें

भले वो मिल जाये एक दुसरे से और लगे बेतरतीब

क्यूंकि पेंटिंग का कोई चेहरा नहीं होता

और न ही कविता की कोई शक्ल

दो आँखें भर होती हैं उनकी

तो उस कबाड़ख़ाने में पड़े उस टूटे टूथब्रश को देखो

वो पतझड़ के टूटे पत्तों सा है

एक नया पत्ता जो दिखा है कल ही

वो पूछ रहा है तुमसे

तुम फिर से पेंटिंग क्यूँ नहीं करते

तुम फिर कोई कविता क्यूँ नहीं लिखते

 

We all are November

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Here comes the November

the month of autumn leaves

the season takes a turn in deep sleep

Like promises turn away suddenly

when the morning cold

speak of incomplete desires

The zari border ripped of a benarasee saree

i had long kept to save up a memory

What are we, a question lingers

The tangerine hue of a summer afternoon

the arid dreams in a desolate life

the crimson shades of an evening in spring

or the shivers, quiver, shudder of a winter night

We all are distracted flustered souls

A little in October

afraid of December

Wanting to be ubiquitous

here and there, inside -out

We all are fragments of November.

P.S.- I am writing this poem to mark the advent of Blogbuddy3.0 program in November

with Blogchatter and let me introduce you to the buddies with whom i will be blogging with. Make way for Expecto Patronum

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Dear Pseudo Feminist Girl in town

I wrote this piece for #DelhiPoetrySlam  retreat and was amazed at the response i got after this. My buddy at Bihar ( Remya meri jaan ), my  rockstar friend Praicey help me improvise it and my beautiful roomies at Jaipur – Neha and Sidd were so enthusiastic about making it perfect. A poem that slams pseudo feminists came up with the help of some wonderful women who are pure and raw in their thinking. More power to women like you.

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“Dear Pseudo feminist girl in the town
I see so much of you these days around.
I know you are cool
I know you meant good
But when did you actually drift away
Where was that turn when you lost your away
We started off together on this beautiful journey
Of fighting for equality and gender parity
But let me tell you a little story
Do you care about one kusum going back to brothels
Or its just the fab India sarees about which you only bother.
Do you know a Laxmi who  faces domestic violence
But your dharnas and pradarshans are still in abundance
In Churu a Rani is married at the age of 5
And your pink or blue or green chaddhi campaign are still giving you high
The sex workers at GTB road have a life that is an absolute mess.
Just tell me, confessing about your bra color campaign is awareness?.
You know I liked you once
I dated you long
I was so fond of you
I thought that the bond was strong.
Came the barge of opinions and volley of accusations
Dear pseudo feminist girl in the town
When did a beautiful movement that started back there

turn into “Why the Fuck are men even here”
Away from the real life problems
And the issues that matter
All you care about is those 140 characters.
I don’t need your idea of feminism because
I believe in equality not supremacy
Because misandry is as bad as misogyny
Because men are not presumptive rapists
Because women are not always the helpless victims.
Dear pseudo feminist girl in town
Chill a little
Take a long breath
Lets get together and throw away the labels
Of feminism
Of sexism
Of racism
Of religion
Lets join hands and throw away the hatred
A father
A brother
A friend
A boyfriend
A husband
A son
Can’t you see any of the good men?
So dear pseudo feminist girl in town
Don’t turn feminism into
Another form of division
I am for feminism that is humanism.
You meet at hard rock cafe
On a Friday night
Order oh blood Mary
Oh ……Oh sorry that’s a ladies drink
You order some whiskey and some rum
And collectively  start abusing men
“Saale C****YE hain saare”

“SAALON KI MAAR KE RAKH DENI HAI”
“SCREW YOU MEN”
” FUCK THEM OFF”
I know abuses are just words sweetheart
But drinks can be ladies and not the world
So Dear Pseudo Feminist,let’s hang together
You gotta tell me what’s your dimaag ke andar
Your dharnas aren’t making any difference
To kusum and friends

Everyday, every moment
They are still toying the line of domestic violence.”

Thank you #DelhiPoetrySlam and our amazing mentor- Jamaal Jackson Rogers. I love you for the amazing person you are.