“लड़का होगा तो वंश बढ़ायेगा” को साक्षी की धोबी पछाड़

 

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11 दिन की मायूसी के बाद भारतीय प्रशंसकों को जश्न मनाने का मौका मिल गया है ।58 किलोवर्ग में महिला पहलवान साक्षी मलिक ने किर्गिस्तान की ऐसुलू ताइनीबेकोवा को 8-5 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल जीता।

पहले पीरियड में 5-0 से पिछड़ने के बाद साक्षी ने दूसरे पीरियड में 8 अंक बनाए और भारत को रियो ओलंपिक का पहला पदक दिलाया।भारतीय इतिहास में पहली बार किसी महिला पहलवान ने ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीता है।

पहला पदक साक्षी मालिक ने लाकर हमारे गिरते सेल्फ रेस्पेक्ट को एक धक्का डे दिया है और हम खड़े हैं साथ इस गर्व के हिस्सेदार. हर राउंड में साक्षी को संघर्ष करना पड़ा, किर्गिस्तान की ऐसुलू ताइनीबेकोवा के साथ हर राउंड में संघर्ष करती साक्षी को जब मौका मिला तो उन्होंने पूरी जीवटता से ऐसा दांव खेला जिसका कोई तोड़ नहीं था.और वो जीत गयी, और हम जीत गये

रक्षाबंधन के दिन जब हमारे देश में कलेक्टिव रूप से सारे भाई, बहनों की रक्षा का प्रण लेंगे, उसी दिन रोहतक की इस लड़की ने हम सबकी इज्ज़त रख ली. पर क्या ये संघर्ष आज का है। संघर्ष की कहानी लम्बी है, जड़े गहरी हैं. पहले “बेटा होगा तो वंश बढ़ायेगा “ की मायूसी में दुनिया में आने की जद्दोजेहद, फिर अपने सपनों को समझाने की लड़ाई, कही किसी की परमिशन तो कही किसी को कन्विंस, यह कुश्ती सिर्फ अखाड़े में नहीं थी, यह अखाड़े से कहीं ज्यादा बाहर थी ।जहाँ ज़िन्दगी के हर निर्णय की कड़ी अन्दर से ज्यादा बाहर से जुड़ती है,सिर्फ लड़की होने के कारण कुछ पूर्व निर्धारित सीमाओं के साथ समझौता करना हर लड़की को सिखाया जाता है वहां साक्षी , हमें तुम पर गर्व है।

अभी नेपाल में एक अमेरिकन यात्री ने मुझसे पूछा था कि क्या भारत में अभी भी औरतों को अपने सपनों, अपनी आकांक्षाओं के लिये लड़ना पड़ता है? मैंने कहा था ” परिस्थितियां बदली हैं, पर कहीं पर एक बचा हुआ संघर्ष अब भी है , पर अंत में यह लड़ाई हम सब की है और यह लड़ाई भी उतनी ही ख़ास है जितनी जीत”। शुक्रिया साक्षी, हमारी बात को मेडल दिलाने के लिये, हमारी “at bthe end of the day, it’s all worth it” को सच करने के लिये।

थाली पीटो, खूब नाचो, लड्डू बाँटों………………..म्हारे गाँव में छोरी हुई है.।

 

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