SAKSHAAT 7.0: नाम तो सुना ही होगा ..मिलिये द लल्लनटॉप की टीम से

 

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टीम लल्लनटॉप 

जेठ की तपती दुपहरी में मैं नोयडा फिल्म सिटी पहुँचती हूँ, लल्लनटॉप के ऑफिस. एक खुशनुमा सा इनफॉर्मल सा ऑफिस जिसमें बीच बीच में “अरे ये पीस ठीक है क्या” के साथ ठहाकों की आवाज़ सुनाई देती है. लल्लनटॉप के सरपंच सौरभ से बातचीत शुरू होती है और बीच में कोई आकर पूछता है “हम विडियो में इस बार कुछ नहीं बताएँगे, बोलेंगे जाकर देख आओ” और सरपंच जी बोलते हैं “ जैसा तुमको ठीक लगे वैसा करो यार”.तो इस पूरे इंट्रोडक्शन का सार यह है कि लल्लनटॉप जैसा लिखता है वैसा ही दिखता है.

आइये आपको The लल्लनटॉप की टीम से रूबरू कराते हैं:

सौरभ द्विवेदी– हम हैं लल्लनटॉप

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दुनिया में तीन शहर हैं. मुंबई, दुबई और उरई. ये दुबे उरई से है. सौरभ कहते हैं कि वह किसान बनेंगे, साहित्य से उनका वास्ता बहुत देर से पड़ा पर मैं बता दूँ कि इस आदमी के बोलने पर न जाइयेगा, जब वो कहीं और शून्य में देखते हुए बोलते हैं तो वो ऐसी गहरी बात कह जाते हैं जो आपको कुछ सोचने पर, पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर देगी. अपने को खुरदुरेपन का आशिक. भाषा और सभ्यता के लिहाफ और हर तरह की चिकनाहट से दूर मानते हैं . ‘सौरभ से सवाल’ कॉलम का धरता कर्ता.सौरभ सरपंच को हम देते हैं “हम हैं लल्लनटॉप” का ख़िताब .

सौरभ का सल्लू भाई, ममता कुलकर्णी  वाला आर्टिकल ज़रूर पढ़ें और कुछ सीरियस सुनना हो तो “अगर तुम लेखक बनना चाहते हो” को सुनें, उनकी आँखें बोलती हैं इस कविता के पाठ में.

कुलदीप सरदार – अबे हम हैं लल्लनटॉप

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जीरो फिगर पर करीना कब से मूव on कर चुकी हैं पर कुलदीप अभी भी टिके हुये हैं. पर इनके वजन पर मत जाइयेगा, आप कुलदीप से ५ मिनट बात करेंगे तभी आप जान जायेंगे कि लल्लनटॉप इतने कम समय में इतना सफल कैसे हो गया, कुलदीप और उनकी पूरी टीम के आँखों में दीखता है लल्लनटॉप के लिये प्यार- वो पहला प्यार जैसा. काटते हैं, मगर मीठे में. कोई छेड़ता है तो मुरव्वत से पूछते हैं, ‘अबे टोपा हो का? और बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि हमें कुछ नया करना होगा आने वाले समय में, सिर्फ बकैती नहीं चलेगी ज्यादा दिन तक. यूँ कि बड़े बुजुर्ग कह गये हैं कि अगर आप अपने सबसे बड़े सेल्फ क्रिटिक हो तो सफलता कभी नहीं भागेगी और सरदार इसे समझता है. इसीलिये “अबे हम हैं लल्लनटॉप “का टाइटल कुलदीप को .

विकास टिनटिन – असली लल्लनटॉप तो रवीश कुमार हैं

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बिट्टू ये बालक सीलमपुर का सल्लमसौंटा है. लिजलिजे ह्यूमर का मालिक. जब तक मुस्का रहा है ठीक है. उंगली करोगे तो ले लेगा, मौज. अकेले घूमता है और प्रेमी बनना चाहता है. मगर कामयाबी विश्व शांति की तरह कोसों दूर है. बालों से इम्तियाज अली दिखने की कोशिश. टीम का पाकिस्तान स्पेशलिस्ट. इसके सामने ‘नमस्कार मैं रवीश कुमार’ को कुछ न कहिना बे, वर्ना फेरीभैंटोला टाइप की कोई गाली देता है. पैशन प्लस का गर्वीला सवार. बस उसमें ‘बिरिक’ कम लगती है.

आशीष दैत्य – बहुत बोल लिये सब, अगर तुम लोग लल्लनटॉप हो, तो हम कौन हैं

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बेट्टा आशीष प्रदीप वो चीज है जो चुआ देता है तो स्टेटस बन जाता है. चार साल से कमिटेड है. मुस्कियाने पर मसूड़ों में इत्ती जगह बन जाती है कि परचून की दुकान खुल जाए. कहता है- मैं लिख लेता हूं, समझा नहीं पाता हूं क्योंकि मेरी लार चू जाती है. 6 फीट 2 इंच ऊपर से. इंजीनियरिंग, बैंक एग्जाम की कोचिंग और फेसबुक पर सटायर करते हुए यहां पहुंचा. सुन सब लेता है लेकिन साल में एकाध बार बमक जाता है तो बघेली में गरियाता है. एक्स्ट्रा रोटी खानी पड़े तो पानी से लील लेता है. तकनीकी की ताक धिन से सेटिंग है. बड़े होकर शादी करने का सपना है.

आशुतोष चचा – कुछ भी कर लो बेटा, मचाने वाले लल्लनटॉप तो हम ही हैं

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द लल्लनटॉप में स्टार पॉवर आशुतोष चचा का है ऐसा सुनने में आता है, धारदार वन लाइनर्स इनके धोबी पछाड़ हैं. इनसे किसी ने ग्रुप में पूछा :ज़रा बताओ तो मैडम को कितने फोलोवर्स हैं फेसबुक पर तो शर्माते हुये कहते हैं “ 5000+” एक भोजपुरी मुस्कान के साथ.अमेठी से हैं, जहां सत्ता पनारे में बहती थी. झोला उठाकर मोदी के क्योटो गए और फिर केजरीवाल की दिल्ली आ गए. बदन से गांव को खुरचने का हड़बोंगपन सवार नहीं हुआ है. भुच्च देहाती सेंस ऑफ ह्यूमर. गर्लफ्रेंड ने तखल्लुस दिया था ‘उज्ज्वल’. वो चली गई, तखल्लुस रह गया. इनके फेसबुक पेज पर ज़रूर जायें, लाफ्टर थेरेपी की खुराक वहीँ से लीजिये,अपने सेंस ऑफ़ ह्यूमर से मचा दिया है आशुतोष ने.

प्रतीक्षा पीपी – यूँ कि ये किसने कहा कि लल्लनटॉप कोई मर्द है

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बाकी सभी एक तरफ और प्रतीक्षा का satire एक तरफ. जेंडर पैरिटी की कोई चिंता न करें, ये नारी सब पर भारी है.कहती हैं कि मीडिया में बस यूँ ही आ गये और जब ये आ ही गयी हैं तो पोस्टर फाड़ के आई हैं. फेमिनिस्ट मुद्दों पर तार तार करती हैं. अगर आपने प्रतीक्षा का भाई – बहन वाला आर्टिकल नहीं पढ़ा तो बुरबक पढ़ा क्या है:

 

 

 

मिहिर पंड्या – क्यूंकि पिक्चर अभी बाकी है लल्लनटॉप

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जब मैं साक्षात् के लिये लल्ल्नटॉप के ऑफिस गयी थी तब मिहिर नहीं थे टीम में, अभी कुछ दिन पहले ही शामिल हुये हैं और सिनेमा पर लिखते हैं. अगर आप फिल्में देखना पसंद करते हैं, सिनेमा पर बात करते हैं और हाथ में दैनिक भास्कर आने पर सबसे पहले जय प्रकाश चौकसे का कॉलम पढ़ते हैं तो आपको मिहिर को ज़रूर पढ़ना चाहिये. अगर आप सलमान की एंट्री पर सीटियाँ बजाते हैं,कौन सा नया ट्रेलर आया ये सर्च करते हैं और फिल्में आपके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं तब तो आपको मिहिर को ज़रूर से पढना चाहिए .सिनेमा पर इनका लिखा हर पीस शानदार होता है. एक ओपन सीक्रेट है कि सिनेमा में स्ट्रोंग फीमेल करैक्टर के प्रति बायस्ड हैं मिहिर. कंगना को लिखा इनका खुला ख़त हर लड़की को पढ़ना चाहिये, क्यूंकि हर देश में आँसू का रंग एक ही होता है

रजत सैन : बना लो तुम सब लल्लन, टॉप तो मेरे कैमरा का कमाल है 

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जितनी प्यारी रजत की मुस्कराहट है, उतनी ही बेहतरीन उनकी फोटोग्राफी. लल्लनटॉप के विडियो और फोटो के पीछे का नाम है रजत.रजत कहते हैं कि इन सब के साथ रहते हुये वे भी थोडा बहुत लिखने लगे हैं. और जो लिखने लगे हैं तो साड्डा पंजाब पे अच्छा लिखते हैं.

इसके अलावा लल्लनटॉप पर दिव्य प्रकाश दुबे की ” सन्डे वाली चिठ्ठी” को पढ़ना तो सन्डे जितना ही जरुरी है. क्यूँ पढ़े? सब हम यहीं बता दें तुम्हें… तो तुम पढ़ोगे क्या ?

 

 

लल्लनटॉप जितना रोचक है उतना ही उसका नामकरण भी.सौरभ अपने बचपन का एक किस्सा बताते हैं कि उनका एक भाई फ़ौज में जाना चाहता था.पर उसकी एक दिक्कत थी वह ज्यादा दूर तक दौड़ नहीं पाता था, डॉक्टर को दिखाया तो पता चला नाक की एक हड्डी लम्बी होने की वजह से यह समस्या आ रही थी. उनके चाचाजी ने भाई से कहा “बस एक छोटी सी सर्जरी होगी और तुम पूरे लल्लनटॉप हो जाओगे”. “ बाल नरेन्द्र” की तरह बाल सौरभ भी बचपन से ही सबसे अलग थे, नहीं नहीं उन्होंने किसी मगरमच्छ को नहीं मारा था पर उसने इस शब्द को धर लिया और आगे चलकर हिंदी को The लल्लनटॉप मिला.

सवाल : लल्लनटॉप कैसे और क्यूँ?

सौरभ : दी लल्लनटॉप से पहले मैंने 8- 9 साल स्टार न्यूज़, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर में काम किया. पर हमेशा लगता था कि हिंदी जर्नलिज्म में कुछ ऐसा लाया जाये जिसमें मास अपील हो, जो इंगेजिंग हो, एंटरटेनिंग हो. जो नये आइडियाज पर आधारित हो, जिसकी भाषा घिसी हुई चमकीली न हो, जिसमें कृत्रिम गुरुता का बोध न हो.जिसकी भाषा………(थोड़ा सोचते हुये) 80s की खालिस भाषा हो जैसे प्रभाष जोशी की भाषा, जैसे मालवा की बोली.

(सौरभ अब किसी शून्य में देखने लगते हैं , जिसके बारे में पहले ही वार्निंग दे दिया गया था, अब वो कवि बन जाते हैं)

देखिये तराजू स्थिर रहता है, निगाह हट जाती है. लल्लनटॉप कोशिश है कि वो निगाह न हटे.

सवाल : लल्लनटॉप की शुरुआत कैसे हुई?

सौरभ : लल्लनटॉप सोच की शक्ल में सबसे पहले विकास (जो मेरा बायाँ हाथ हैं) ,कुलदीप (जो मेरा दायाँ हाथ हैं) और मेरे दिमाग में आया. हम तीनों मानते थे कि ज्ञान को सत्ता के बरक्स खड़े रहना चाहियेऔर यहाँ ज्ञान का तात्पर्य पत्रकारिता से है. पत्रकार भी तो एक स्टोरी टेलर है, कलाकार है, उसे सिहांसन का मद नहीं होना चाहिये.

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तो हम तीन जर्नलिस्ट दोस्त और तीन नॉन-जर्नलिस्ट लोग प्रतीक्षा (फेसबुक पर लिखती थी प्रतीक्षा,बहुत ही ब्लंट, मारक किस्म का), आशुतोष (बनारस में रहते थे और फेसबुक पर इनके वन लाइनर्स गाँव का देहात का ह्यूमर लिये हुये थे) और आशीष (जो भी फेसबुक पर हार्ड हिटिंग लिख रहे थे) मिले और 6 दिसम्बर को आ गया लल्लनटॉप.

इसी टीम में बाद में हमारे विडियो एक्सपर्ट्स केतन और रजत की एंट्री हुई.

सवाल: लल्लनटॉप के पीछे की सोच, कन्विक्शन क्या थी?

सौरभ: कन्विक्शन एक ही थी, हिंदी जर्नलिज्म के मिथ को तोड़ना है. यहाँ ज्ञान से मेरा मतलब पत्रकारिता से है. मद,सिंहासन ये सब तो सता पर काबिज़ लोगों के लिये है, कलाकार को खडाऊ से ज्यादा क्या चाहिये.पत्रकारिता कैसी हो. राज प्रसाद में बैठे स्वर्ण सिंघासन के पाए की तरह. चंवर डुलाने वाले की तरह. बगल में बैठकर राजा की हां में हां मिलाने वाली. या फिर महल से बाहर सम भाव के साथ राज्य को, तंत्र को निहारने और निथारने वाली. जो कभी राजसत्ता में घुसे तो खड़ाऊं बन, निर्मोही संन्यासी की तरह. जिसके चलने की आवाज से चंवर रुक जाएं. जयकार थम जाएं सिर्फ कठोर और जटिल सत्य का संधान हो.

सोच की बात करूँ तो “We live with the choices we make”, हम वही लिखते हैं जिस पर हम यकीन करते हैं. हम कंटेंट के स्तर पर गंभीर नहीं बहुत गंभीर हैं. मगर हमारी गंभीरता आवरण भर की नहीं है. हम सरोकारी पत्रकारिता जैसे मुहावरे नहीं फेंकते. बल्कि उसे अपनी खबरों में अमली जामा पहनाते हैं.

सवाल : सौरभ के बारे में कुछ बताइये?

सौरभ : सौरभ ने संघ के विद्यालय में पढ़ाई की,उरई में उसने देस को समझा,JNU में देश को. बचपन में मनोहर कहानियाँ, कॉमिक्स, माया, इंडिया टुडे पढ़ने का बेहद शौक. JNU में आकर जाना कि पढ़ने के लिये, सीखने के लिये और जीने के लिये कितना कुछ है. सौरभ को उदय प्रकाश, असगर वजाहत, मनोहर श्याम जोशी, निर्मल वर्मा,राही मासूम रज़ा, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल को पढना पसंद है. सौरभ मार्खेज़ के सपना,हकीकत और रूमानियत में जीता है.

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एक रोज अनुराग कश्यप भी इनसे  मिलने चले आए. बोले लल्लनटॉप मजेदार लगता है, इसलिए आ गया.

(यहाँ मैं सौरभ के डेस्क एक फोटो फ्रेम पर ठिठक जाती हूँ . फोटो फ्रेम पर दो कपल्स की फोटो हैं, elderly कपल्स की. Homo sapiens होने की पहली निशानी – पूछना चाहती हूँ कि यह दो तसवीरें क्यूँ?

पर अपने को समझाती हूँ, यहाँ तो मैं “साक्षात” का अगला इंटरव्यू लेने आई हूँ. पर जिज्ञासा तो जिज्ञासा है, आदि काल से कब कौन इससे मुक्त हो पाया है. फिर सौरभ बताते हैं कि इस तस्वीर में एक कपल माता-पिता हैं, तो दूसरे सास- ससुर. आज जब gender equality सिर्फ नारों, स्टेटस अपडेट और फोटोज में सिमट कर रह जाती है और सोशल मीडिया पर अपने धारदार शब्दों से क्रांति ला देने वाले अक्सर अपने घर के सोफे पर बैठते हुये जब सिर्फ पुरुष बन जाते हैं वहां यह फोटो फ्रेम ज़िन्दगी के उन छोटे snippets की तरह है जो साथ और साझा के बीच का फासला तय कराते हैं. अपने माँ बाबा की तरह अपने साथी के माँ बाबा को प्यार करना, कहने में यह बात जितनी स्वाभाविक लगे,पर बहुत कम ही देखने को मिलता है.

कभी कभी कहानियों की तलाश में हमारे हाथ कुछ खूबसूरत सीपी लग जाते हैं जिन्हें हम संजो कर रखना चाहते हैं, उन्हीं में से एक है किताबों के बगल में रखा वो फ़ोटो फ्रेम.

 

(अब सौरभ उसी शून्य में देखने लगते हैं………अब बात निकली है गुंजन की तो दूर तलक जायेगी)

सौरभ : गुंजन मेरी सबसे अच्छी दोस्त, क्रूरता की हद तक मेरी सबसे कठोर आलोचक, मेरे होने के पीछे का सबसे बड़ा संबल, मुझे grounded रखने की सबसे बड़ी ताकत और मेरी धर्मपत्नी है. हम दस सालों से एक दूसरे को जानते हैं. मुझे लगता है कि जब एक आदमी और औरत शादी के बंधन में टाइम और स्पेस शेयर करते हैं तो सबसे ज़रूरी है कि उनकी बातें कभी कम न हों, शारीरिक आकर्षण तो कम भी हो सकता है समय के साथ. मगर दिमागी आकर्षण और उससे निकसने वाले कौतुहल, संवाद कभी खत्म न हों.मेरी पत्नी में मेरी वो दोस्त है जिसके साथ मैं पूरा दिन गप्पे मार सकता हूँ.

(सौरभ और गुंजन का ऋषिकेश मुख़र्जी की फिल्मों जैसा सीधा और प्यारा रिश्ता, इस साक्षात् का मेरा एक और टेकअवे रहा )

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सवाल : आपसे कोई पूछे कि लल्लनटॉप क्या है ?

सौरभ : लल्लनटॉप महज कीबोर्ड की खटखटाहट नहीं है, उस बच्चे की इसरार है जिसने नयी फिरकी बनाई है और अपने दादू को दिखाना चाहता है- मासूम, ईमानदार, तालाब की मिट्टी जैसा और विनम्र . यह पालतू होने के खिलाफ एक कोशिश है . लल्लनटॉप में ठस है पर यह किसी को ठेस नहीं पहुँचायेगा. लल्लनटॉप ढीठ है पर इसकी ढिठाई भी मीठी है. मीडिया में मारना आसान है, मनवाना कोई नहीं चाहता, लल्लनटॉप में हमारी कोशिश है कि हम आपको मनवाएं कि हिंदी में भी मजेदार लिखा जा रहा है.

हम चाहते हैं कि सीधी सरल सड़कछाप भाषा में रोहिंग्या मुसलमानों से लेकर ट्रंप तक, यूपी की पॉलिटिक्स से लेकर बंबइया सिनेमा तक. हर चीज पर बात हो. मगर पाठक को डराने या फंसाने के लिए नहीं. उसे वाकई में जानकारी और संवेदना से लैस करने के लिए

सवाल : लल्लनटॉप को आप आने वाले समय में कहाँ देखते हैं?

सौरभ : देखिये मेरा मानना है कि कि ये जो सेकंड वर्ल्ड की बात हम करते हैं, यह वर्चुअल वर्ल्ड है. हिंदी के मठाधीशों के कारन हिंदी वाले रुदाली की तरह रोते रहते हैं.  हम चाहते हैं कि लल्लनटॉप बाज़ार की घिंची पकड़ ले, और वह हिंदी भाषा का दुनिया का सबसे जटिल, सबसे जिंदा और इमानदार ब्रांड बने.

 

शुक्रिया सौरभ

शुक्रिया आपका पूजा.

मैं अब बाकी की टीम के साथ लंच करने बाहर निकली हूँ, सौरभ इंटर्नशिप के इच्छुक लोगों का इंटरव्यू लेते हैं. हम बाहर जाते हैं और परांठे आर्डर करते हैं. कुलदीप मुझे दूसरे मीडिया हाउस की लकीरों और लल्लनटॉप के खुले आसमान के बारे में बताते हैं पर उस गोल से टेबल के चारों ओर हँसी, खिलखिलाहट, एक दूसरे की टांग खींचना बदस्तूर जारी है. मैं रजत से पूछती हूँ कि क्या वो खुश है – वह कहता है कि पापा ने कभी खुद से तो नहीं कहा पर दीदी बताती हैं कि पापा मम्मी चंडीगढ़ में लल्लनटॉप को पढ़ते हैं और बहुत प्राउड फील करते हैं.

मैं सबसे विदा लेती हूँ और जानती हूँ कि यही है लल्लनटॉप –रजत की आँखों में दिखती मुस्कराहट, आशुतोष का देसी ह्यूमर, प्रतीक्षा का ब्लंट फेमिनिस्म और उस फोटो फ्रेम के पीछे झाँकती ज़िन्दगी. बेहिसाब दोस्ती की बेबाक आवाज़ है लल्लनटॉप.

P.S- इस लल्लनटॉप के लिये मैं शुक्रगुज़ार हूँ – दिल्ली मेट्रो का जिन्होंने मुझे ऑलमोस्ट आधे दिन में द्वारका से नोयडा पहुँचाया, विक्रम का जिनके साथ बैठकर इस साक्षात् के बाद मैंने आर्ट और पेंटिंग पर कोल्ड कॉफ़ी के न जाने कितने कप ख़त्म कर दिये और राहुल का जो साक्षात् के पीछे की सोच हैं.

 

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