दो फ्री की कॉफी और बनारस

कल से अपनी ट्रैवल डायरी साझा करने को लेकर पशोपेश में हूँ। हम किसी के लिये क्या करते हैं, इसका सर्टिफिकेट दिये बिना क्या हम अपने अनुभव नहीं बाँट सकते?  क्या कुछ देकर ही कुछ लिया जा सकता है?  अगर बिना कुछ दिये हमें बहुत कुछ मिल जाये तो?
आज एक बेहतरीन रेस्तरां के सामने से गुज़री। पहाड़ों की तलहटी पर बना यह रेस्तरां कहानी की किताबों से निकला हुआ सा लगा। मैंने अपने बजट का अनुमान लगाया। अंदर से आवाज़ आयी बिल्कुल सीधा चलो यह तुम्हारे औकात से बाहर है। मुझे पता था कि इस जगह कॉफी पीना मतलब दो दिन का बजट बिगाड़ लेना पर दूर तक फैले औरचिड और पहाड़ों के सिरहाने बैठ कर कॉफी पीने का मोह मैं नहीं छोड़ पायी।

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मैं अंदर जाती हूँ और मैनेजर मुझसे पूछता है कि क्या आप open air buffet लेंगी। यहाँ लगे बफे पर कुछ खाया तो अपने गहने बेचने पड़ेंगे (और गहने मेरे पास हैं भी नहीं)। मैं मुस्कुराकर कहती हूँ “Can I have one coffee please ”
वह मुझे एक टेबल की ओर इशारा करता है। मैं बैठती हूँ और आसपास की सुंदरता में खो जाती हूँ। एक वेटर को कहती हूँ “Can you take a picture of me please ”

वह पलटता है और उसके नेम टैग पर “वाहिद “लिखा है। मैं और मेरे coincidences। अब तो भाड़ में गयी किताब।

कहाँ से हो वाहिद?

आजमगढ़ से मैडम। आप कहाँ से हैं?

अरे हम तुम्हारे पड़ोस से हैं वाहिद, आओ बैठो।

नहीं मैडम मुझे परमिशन नहीं है। आप आराम से कॉफी पी लिजिये।

मैं मैनेजर के पास जाकर पूछती हूँ “Do you mind if I buy him a coffee and have a little chat with him ”
मैनेजर ना में सर हिलाता है। हमारी कॉफी आ जाती है और अंग्रेज़ी बाहर निकल जाती है। हम हिंदी में बात करते हैं और अब यूरोपियन से एसेंट भोजपुरी हो जाता है। वाहिद शरमाते हुये अपनी गर्लफ्रेंड के बारे में बताता है और कहता है कि अगली ईद में शादी करेगा।

वाहिद मुझे बनारस की किसी शादी का किस्सा बता रहा है, उसकी आँखें चमक रही हैं, मुझे एक बार आधी रात को पापा के साथ गंगा पर नाव से जाने की याद हो आती है। घर का एक फ्लैश आ जाता है आँखों के सामने।

वाहिद को अलविदा कह मैं उठती हूँ और बिल देने काउंटर पर जाती हूँ। मैनेजर कहता है “Your coffee is complimentary from our side madam “।मैं मना करती हूँ, वह नहीं मानता और वाहिद की ओर देखकर कहता है “He seems happy today “।मैं शुक्रिया कहती हूँ  वह उसे थैंक्यू समझ कर रख लेता है।

आज का दिन अच्छा गया। मैं बाहर निकलती हूँ और बाहर बैठी अंग्रेज़ी को चलने के लिये कहती हूँ। पीछे पलट कर देखती हूँ तो वाहिद बाय कर रहा है और उसके पीछे खड़े हैं मेरी हिंदी, दो हँसी और बनारस। ठीक से दिखता नहीं पर मुझे पता है कि वे मुस्कुरा रहे होंगे।

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वाहिद के साथ सेल्फी

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