ज्यादा भोकाली में निकल जाती है ऐसी बात

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चित्र साभार- द टेलीग्राफ और मेरी एडिटिंग

पिछले कुछ दिनों में “द टेलीग्राफ “ पेपर ने आतंक मचा रखा था अपने क्रिएटिव हेडलाइंस से। देश जब अभिव्यक्ति की आजादी बनाम देशद्रोह के नित नये रंगों क देख रहा था तब चाहे PATRIOT हो या फिर “क्यूंकि मंत्रीजी कभी स्टूडेंट नहीं थी” जैसे हेडलाइंस के साथ “द टेलीग्राफ” ने जॉर्ज ऑरवेल के उस कहावत को चरितार्थ किया कि “ freedom of press means the freedom to oppose and criticize”.

हम सबने सोचा कि वाह टेलीग्राफ तुम ही हो जो क्रांति कि मशाल जलाये रखोगे।बस तुम रवीश कुमार वाली फैन बेस बनाने ही वाले थे कि तुमने स्मृति ईरानी के सनी देओल को काम्प्लेक्स देने वाले भाषण के लिये उन्हें “AuntyNational” कह दिया. कर दिया न भोकाली?

वही लोग जो तुम्हें बेधड़क शेयर किये जा रहे थे, अब तुम्हारे खिलाफ हो गये। और हो भी क्यूँ न, राजनीतिक विचारधारा एक ओर है पर नारी का अपमान के खिलाफ हम सब साथ हैं।जहाँ सभी को स्मृति ईरानी साक्षात् काली, दुर्गा और झांसी कि रानी लग रही थी वही आपने उन्हें आंटी कहकर रहा सहा गुडविल ख़त्म कर लिया। अभिव्यक्ति की आज़ादी का इतना भौंडा प्रदर्शन? अगर हिम्मत है तो करोल बाग़ की महिलाओं को किसी किटी पार्टी में आंटी कहकर बुलाओ?

खैर चलिये हम सब द टेलीग्राफ को इस एक गलती के लिये माफ़ कर देते हैं।तारीफ झक कि तरह चढ़ती है और जब चढ़ती है तो गुस्ताखी हो जाती है। इस बात का ध्यान रखा जाये कि “freedom to oppose and criticize” की शह में व्यक्तिगत कटाक्ष न हो। नहीं तो स्मृति ईरानी अगली बार कहेंगी “Yes! I am taking it personally”.

फिर तो तुमको रखे राम, तुमको अल्लाह रखे (राम के चांसेस कम ही हैं) ।

 

 

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