तो आखिर ग़ालिब छूट ही गयी शराब ………….रविन्द्र कालिया (1939–2016)

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कुछ दिन पहले सत्यानन्द निरुपम के फेसबुक वाल पर रात के एक बजे पढ़ा कि कालिया जी की अस्वस्थता की खबर चिंताजनक है.उस रात सोते हुए मैंने एक छोटी प्रार्थना उनके स्वाथ्य के लिये की.याद आया पटना में हुई उनसे छोटी मुलाकात और उनके मजाकिया अंदाज़.परसों शाम पता चला वो प्रार्थना खारिज़ हो गयी और कालिया जी का निधन हो गया. वो कितने बड़े संपादक और कहानीकार थे यह लिखना मेरा काम नहीं है पर वो कितने आत्मीय इंसान थे यह ज़रूर बताना चाहूंगी.

बात कुछ समय पहले की है, बातों बातों में एक मित्र ने कहा कि अगर तुम्हें संस्मरण पढ़ने इतने पसंद हैं तो रविन्द्र कालिया की “ग़ालिब छूटी शराब” पढ़ा है कि नहीं? Recommendation तो ग़ालिब छूटी शराब की हुई थी, पर हिंदी समय से प्रिंट निकालकर उसने मुझे 17, रानाडे रोड दे दी, किताबों की दुनिया में मैं जीती हूँ पर 17, रानाडे रोड जो गलती से मुझे संस्मरण कह के दिया गया था, उसे पढ़कर मैं कुछ बौरा सी गयी. बार बार फ़ोन कर के पूछना ये संस्मरण है? इतना फिल्मी? इतना मजेदार?खैर देने वाले को अपनी भूल का अंदाज़ा हुआ और मेरे हाथ आयी “ग़ालिब छूटी शराब”

उस वक़्त अपनी एक मित्र के शादी के लिये जयपुर जा रही थी. पटना से दिल्ली का ट्रेन का सफ़र और दिल्ली से जयपुर का बस का सफ़र मैंने रविन्द्र कालिया और उनकी बेबाकी के साथ काटा. “ग़ालिब छूटी शराब” का आलम ये था कि पूरा सफ़र मैं इसे पढ़ते रही और दोस्त की संगीत के बात भी अपने रूम पर आकर उसे ख़त्म किया. तो इस तरह मैं मुरीद हो गयी रविन्द्र कालिया के लेखन की.

पटना कथा समारोह में पता चला कि रविन्द्र कालिया और ममता कालिया आ रहे हैं (इस बीच में इन दोनों कि कितनी ही रचनायें पढ़ डाली ) तो वहाँ जाने की एक और पुख्ता वजह मिल गयी. पटना में आये भयंकर भूकंप की बदौलत मुझे कालिया जी से बात करने का मौका मिला. नेपाल भूकंप के आफ्टर शॉक्स दो तीन दिन तक ज़ारी थे और कथा समारोह के बीच में जब भी जमीन हिलती, लोग भागकर बाहर लॉन की ओर निकल जाते.

बस ऐसा ही एक आफ्टर शॉक और कालिया जी से भेंट. बात ब्लॉग कि निकली तो कालिया जी ने कहा “ लेखन तो बहुत अच्छा ब्लॉग के माध्यम से हो रहा है” और उन्होंने अपने जेब से एक छोटी डायरी निकाल कर मुझसे अपना ब्लॉग लिंक लिखने को कहा. मैंने ब्लॉग लिंक लिखा तो उन्होंने कहा अपना फ़ोन नंबर भी लिख दो, मैं परेशान नहीं करूँगा ब्लैंक कॉल कर के. अब वो ज़माना गया जब कालिया लड़कियों को परेशान किया करता था.

तो ये थी मेरी रविन्द्र कालिया के साथ पहली मुलाकात, इतना बड़ा लेखक और इतना आत्मीय व्यवहार. गौरैया कहानी के पाठ के पहले ही उन्होंने श्रोताओं को चेता दिया था कि वो ममता जी की तरह अच्छा कहानी पाठ नहीं करते. उनकी पंजाबी एक्सेंट वाली हिंदी को सुनना एक हास्यास्पद अनुभव होता है. दो दिन के कथा समारोह के कारण एक अच्छा समय उनके साथ व्यतीत किया. ममता जी और रविन्द्र जी कि नोंक – झोंक,साहित्य खासकर अंग्रेजी साहित्य के प्रति दोनों का विपरीत दृष्टिकोण और उस पर होती डिबेट्स हमेशा याद रहेंगी.

कथा समारोह का आखिरी दिन था, उन दोनों से विदा लेने और अपनी कहानी देने के लिये मैं उस होटल पहुंची जहाँ वे रुके हुए थे , ममता जी पैकिंग में व्यस्त थी और रविन्द्र जी आराम कर रहे थे. इस व्यस्तता के बीच में भी उन दोनों ने फुर्सत से मेरी कहानी पढ़ी, उस का अंत उन्हें अच्छा नहीं लगा और उन दोनों ने उसे फिर से एक बार और लिखने के लिये कहा. इंग्लिश में लिखी कहानी की तारीफ किया और कहा “ममता इंग्लिश में बहुत अच्छा लिखती थी. इसकी कविता है “ a tribute to papa “ पढ़ना, बहुत शोर मचा था उसका जब ममता ने लिखी थी “.

दो अलग राइटिंग स्टाइल्स के लोग, दो अलग व्यक्तित्व, कहनी विधा में दो बड़े नाम और दोनों की एक ख़ास बात–अपनी सफलताओं से अलग बहुत ही मिलनसार, विनम्र और नए लेखकों को प्रोत्साहन.मैंने उनके निधन के बाद बहुत से लेखों में पढ़ा कि किस तरह उन्होंने नया ज्ञानोदय में लेखकों को जगह दिया, हर किसी को उसके काम का क्रेडिट दिया और सोशल मीडिया के पक्षधर रहे.

एक ऐसे दौर में जब साहित्यिक पत्रिकाएं अपनी पुरानी साख को बचाने के लिये संघर्ष कर रही थी, ऐसे समय में नया ज्ञानोदय को एक ऊंचाई तक पहुंचाने का काम रविन्द्र कालिया ने किया .वे धर्मयुग पत्रिका से अपना लोहा मनवा चुके था. फिर उन्होंने वागर्थ की किस्मत को भी बदला.उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे बाजार को भी बखूबी समझते हैं और साहित्य के लोगों की दिलचस्पी को भी.

हिट अंकों के इसी दौर में सबसे क्रांतिकारी पल तब आया जब नया ज्ञानोदय का 2009 में प्रेम विशेषांक आया. इसके अंकों ने तो हिंदी साहित्य में हंगामा मचा दिया और हिंदी साहित्य में हड़कंप मच गया.  वे अपने अंतिम दिनों में भी वर्तमान साहित्य के सलाहकार संपादक रहे.

वापस लौटते हैं हम उसी होटल रूम की ओर, होटल स्टाफ ने घंटी बजायी , मैंने दरवाज़ा खोला तो उसने पूछा “ कोई लगेज नीचे पहुँचाना है क्या?” ममता जी बाथरूम में थी, मैंने लगेज बाहर निकलवाया और गैलरी में रविन्द्र जी के साथ ममता जी के आने का इंतज़ार करने लगी. इस पर उस स्टाफ ने पूछा “ और कोई सामान है क्या सर”

रविन्द्र कालिया “ एक ख़ास सामान रह गया अन्दर पर तुमको हाथ नहीं लगाने दूंगा भाई, शादी किया है उससे”

हम सभी ज़ोर से हँस दिये, इस बीच कालिया जी का “ख़ास सामान “ भी बाथरूम से बाहर आ गया.

बस ऐसे ही याद आएंगे रविन्द्र कालिया जी………….नमन.

memories

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