Why i can’t travel light

Why I can’t travel light

Stuffing my luggage up to the brim

I still wonder what else could I need

Everyone advises to travel light

And the unknown adds up the plight

What if I need a word of solace

A hug, a kiss

And compassion

May be I will need a tear to shed

Or a smile that hides the red

What if I need some courage

To shoo away the ghosts

That feel so near

I may tuck away in a corner

The insecurities

The embarrassments

The grey desires

In one pocket I may keep

An empty heart

Bleeding &bruised

Bandaged with hope

Zipped in one compartment

Would be kept those familiar ones

All “Ifs & Buts”

I wanted to but don’t have balls

The circumstances that led to us

Understandings which I never understand

It seemed so possible but it was not

You were perfect but I was not

In one hand bag that I carry along

I stuff the memories

Of summer days

And starry nights

A life looked from afar

The art of letting go

Is easier said than done

Why I can’t travel light

Why it’s hard to say a goodbye

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image courtesy- lava360.com

माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या ………..

आज अखबार में खबर पढ़ी कि एक महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर में 26 जनवरी को उस सालों पुरानी परंपरा को तोड़ने की तैयारी कर रहा है जिसमें महिलओं का उस चबूतरे पर जाना वर्जित है जहां शनि पत्थर स्थापित है।पिछले साल नवंबर महीने में शिंगणापुर शनि मंदिर के चबूतरे पर एक महिला के प्रवेश पर काफी बवाल हुआ था. मंदिर के पुजारियों और गांव के लोगों ने मंदिर का शुद्धिकरण किया था।परंपरा का हवाला देते हुए कहा गया कि शनि मंदिर के चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

मुंबई के शिंगणापुर शनि मंदिर में महिलाओं के लिए कुछ नियम हैं. इस मंदिर में. हाल ही में अनीता शेटे को मंदिर ट्रस्ट का अध्यक्ष चुना गया है और वह भी शनि मंदिर में महिलाओं के लिए बने नियमों को नहीं बदलना चाहतीं।

शनि शिंगणापुर मंदिर की अध्यक्ष अनीता शेटे भी महिलाओं से जुड़ी 400 साल पुरानी परंपरा नहीं तोड़ना चाहतीं।अनीता का कहना है कि हम इस परंपरा को कायम रखना चाहते हैं। मंदिर की पवित्रता के लिए गांव के ज्यादातर लोगों की भी यही मान्यता है कि चबूतरे पर महिलाओं का प्रवेश न हो।

पढ़कर अच्छा लगा, याद आया इस मंदिर से जुड़ी एक ऐसी घटना जिसने मेरे बाल मन को विचलित कर दिया था, कुछ साल पहले मैं अपनी माँ की सहेलियों के साथ शनि शिंगणापुर और शिर्डी की यात्रा पर गयी थी। तो हुआ ये कि यह महिला समूह शनि शिंगणापुर मंदिर पहुंचा, महिलाओं का शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ाना वर्जित होता है इसीलिए सभी लोग किसी प्रॉक्सी की तलाश में लग गये जो उनकी तरफ से शनि भगवान पर तेल चढ़ा दे।

जहाँ सब महिलायें व्यस्त हो गयी तो मैं घूमते, घूमते उस चबूतरे पर पहुँच गयी और चबूतरे के किनारे लगी रेलिंग पकड़ कर प्रतिमा पर हो रही पूजा देखने लगी इस बात से बिलकुल अनजान कि मैं कितना बड़ा “पाप” कर रही हूँ।थोड़े देर बाद एक पंडित का ध्यान रेलिंग को पकड़े इस छोटी सी लड़की पर गया।वो उसकी ओर बढ़े, हाथ से एक धक्का दिया और कहा “ माँ ने कुछ सिखाया नहीं क्या?” वो बच्ची थोड़े देर रोती रही, उसे समझ ही नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी. उसे कारण तो बता दिया उसकी माँ ने पर फिर भी उसे समझ नहीं आया कि उसकी गलती क्या थी।

ऐसा नहीं है कि शनि शिंगणापुर ही ऐसा मंदिर है जहाँ इक्कीसवी शताब्दी में भी ऐसी रिग्रेसिव परम्परायें चल रही हैं. कई ऐसे पूजा स्थल हैं जो नारी सशक्तिकरण को चिढाते हुए खड़े हैं- राजस्थान के पुष्कर शहर के कार्तिकेय मंदिर, मुंबई के वर्ली समुद्र तट पर हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह और केरल के तिरुअनंतपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर।

वे 400 महिलायें जिन्होंने इस मंदिर में जाने और सदियों से चल रही अंधी परम्पराओं को चुनौती देने का फैसला लिया है, जाइए : उस बच्ची के लिये, इस लेखक के लिये, सदियों से पीछे धकेली जा रही औरतों के लिए और उन स्त्रियों के लिये भी जाइये जो आपको धर्मं के नाम पर, परंपरा के नाम पर रोकने की कोशिश करेंगी ।

नयी शताब्दी के दौर में इसी देश में स्त्री ने कई पुरुष वर्चस्वी क्षेत्रों में हस्तक्षेप किया है। विस्मय तब होता है जब धर्म के नाम पर वह मनुस्मृति के विधान धारण करने लगती है, वह हर उस नियम को स्वीकार करती है जो उसके लिए किसी और ने लिख छोड़े हैं , यह कुछ और नहीं रूढ़ परम्पराओं के प्रति उसकी भयजनित मान्यता दर्शाता है …विचित्र लेकिन सच।

“ आओ मिलें

मिलकर तोड़े

हर उस ज़ंजीर को

जिसने कल पैर बांधे थे

आज गला जकड़ रहे हैं

देवी-देवी के ढोल ने हमें कर दिया है बहरा

श्रध्दा के शोकगीत से होती है उबकाई

परम्परायें जब उठाती हैं सर

तो कुचले जातें हैं कितने नारी विमर्श के स्वर

गन्दा समझ जिसे करते हो बाहर

गर उस खून का रंग लाल है

तो क्रांति का भी

मैं नकारती हूँ तुम्हारे हर उस भगवान को

जो माँ की कोख से नहीं जन्मा है “

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फोटो साभार- इंडिया टीवी

 

 

 

तो आखिर ग़ालिब छूट ही गयी शराब ………….रविन्द्र कालिया (1939–2016)

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कुछ दिन पहले सत्यानन्द निरुपम के फेसबुक वाल पर रात के एक बजे पढ़ा कि कालिया जी की अस्वस्थता की खबर चिंताजनक है.उस रात सोते हुए मैंने एक छोटी प्रार्थना उनके स्वाथ्य के लिये की.याद आया पटना में हुई उनसे छोटी मुलाकात और उनके मजाकिया अंदाज़.परसों शाम पता चला वो प्रार्थना खारिज़ हो गयी और कालिया जी का निधन हो गया. वो कितने बड़े संपादक और कहानीकार थे यह लिखना मेरा काम नहीं है पर वो कितने आत्मीय इंसान थे यह ज़रूर बताना चाहूंगी.

बात कुछ समय पहले की है, बातों बातों में एक मित्र ने कहा कि अगर तुम्हें संस्मरण पढ़ने इतने पसंद हैं तो रविन्द्र कालिया की “ग़ालिब छूटी शराब” पढ़ा है कि नहीं? Recommendation तो ग़ालिब छूटी शराब की हुई थी, पर हिंदी समय से प्रिंट निकालकर उसने मुझे 17, रानाडे रोड दे दी, किताबों की दुनिया में मैं जीती हूँ पर 17, रानाडे रोड जो गलती से मुझे संस्मरण कह के दिया गया था, उसे पढ़कर मैं कुछ बौरा सी गयी. बार बार फ़ोन कर के पूछना ये संस्मरण है? इतना फिल्मी? इतना मजेदार?खैर देने वाले को अपनी भूल का अंदाज़ा हुआ और मेरे हाथ आयी “ग़ालिब छूटी शराब”

उस वक़्त अपनी एक मित्र के शादी के लिये जयपुर जा रही थी. पटना से दिल्ली का ट्रेन का सफ़र और दिल्ली से जयपुर का बस का सफ़र मैंने रविन्द्र कालिया और उनकी बेबाकी के साथ काटा. “ग़ालिब छूटी शराब” का आलम ये था कि पूरा सफ़र मैं इसे पढ़ते रही और दोस्त की संगीत के बात भी अपने रूम पर आकर उसे ख़त्म किया. तो इस तरह मैं मुरीद हो गयी रविन्द्र कालिया के लेखन की.

पटना कथा समारोह में पता चला कि रविन्द्र कालिया और ममता कालिया आ रहे हैं (इस बीच में इन दोनों कि कितनी ही रचनायें पढ़ डाली ) तो वहाँ जाने की एक और पुख्ता वजह मिल गयी. पटना में आये भयंकर भूकंप की बदौलत मुझे कालिया जी से बात करने का मौका मिला. नेपाल भूकंप के आफ्टर शॉक्स दो तीन दिन तक ज़ारी थे और कथा समारोह के बीच में जब भी जमीन हिलती, लोग भागकर बाहर लॉन की ओर निकल जाते.

बस ऐसा ही एक आफ्टर शॉक और कालिया जी से भेंट. बात ब्लॉग कि निकली तो कालिया जी ने कहा “ लेखन तो बहुत अच्छा ब्लॉग के माध्यम से हो रहा है” और उन्होंने अपने जेब से एक छोटी डायरी निकाल कर मुझसे अपना ब्लॉग लिंक लिखने को कहा. मैंने ब्लॉग लिंक लिखा तो उन्होंने कहा अपना फ़ोन नंबर भी लिख दो, मैं परेशान नहीं करूँगा ब्लैंक कॉल कर के. अब वो ज़माना गया जब कालिया लड़कियों को परेशान किया करता था.

तो ये थी मेरी रविन्द्र कालिया के साथ पहली मुलाकात, इतना बड़ा लेखक और इतना आत्मीय व्यवहार. गौरैया कहानी के पाठ के पहले ही उन्होंने श्रोताओं को चेता दिया था कि वो ममता जी की तरह अच्छा कहानी पाठ नहीं करते. उनकी पंजाबी एक्सेंट वाली हिंदी को सुनना एक हास्यास्पद अनुभव होता है. दो दिन के कथा समारोह के कारण एक अच्छा समय उनके साथ व्यतीत किया. ममता जी और रविन्द्र जी कि नोंक – झोंक,साहित्य खासकर अंग्रेजी साहित्य के प्रति दोनों का विपरीत दृष्टिकोण और उस पर होती डिबेट्स हमेशा याद रहेंगी.

कथा समारोह का आखिरी दिन था, उन दोनों से विदा लेने और अपनी कहानी देने के लिये मैं उस होटल पहुंची जहाँ वे रुके हुए थे , ममता जी पैकिंग में व्यस्त थी और रविन्द्र जी आराम कर रहे थे. इस व्यस्तता के बीच में भी उन दोनों ने फुर्सत से मेरी कहानी पढ़ी, उस का अंत उन्हें अच्छा नहीं लगा और उन दोनों ने उसे फिर से एक बार और लिखने के लिये कहा. इंग्लिश में लिखी कहानी की तारीफ किया और कहा “ममता इंग्लिश में बहुत अच्छा लिखती थी. इसकी कविता है “ a tribute to papa “ पढ़ना, बहुत शोर मचा था उसका जब ममता ने लिखी थी “.

दो अलग राइटिंग स्टाइल्स के लोग, दो अलग व्यक्तित्व, कहनी विधा में दो बड़े नाम और दोनों की एक ख़ास बात–अपनी सफलताओं से अलग बहुत ही मिलनसार, विनम्र और नए लेखकों को प्रोत्साहन.मैंने उनके निधन के बाद बहुत से लेखों में पढ़ा कि किस तरह उन्होंने नया ज्ञानोदय में लेखकों को जगह दिया, हर किसी को उसके काम का क्रेडिट दिया और सोशल मीडिया के पक्षधर रहे.

एक ऐसे दौर में जब साहित्यिक पत्रिकाएं अपनी पुरानी साख को बचाने के लिये संघर्ष कर रही थी, ऐसे समय में नया ज्ञानोदय को एक ऊंचाई तक पहुंचाने का काम रविन्द्र कालिया ने किया .वे धर्मयुग पत्रिका से अपना लोहा मनवा चुके था. फिर उन्होंने वागर्थ की किस्मत को भी बदला.उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे बाजार को भी बखूबी समझते हैं और साहित्य के लोगों की दिलचस्पी को भी.

हिट अंकों के इसी दौर में सबसे क्रांतिकारी पल तब आया जब नया ज्ञानोदय का 2009 में प्रेम विशेषांक आया. इसके अंकों ने तो हिंदी साहित्य में हंगामा मचा दिया और हिंदी साहित्य में हड़कंप मच गया.  वे अपने अंतिम दिनों में भी वर्तमान साहित्य के सलाहकार संपादक रहे.

वापस लौटते हैं हम उसी होटल रूम की ओर, होटल स्टाफ ने घंटी बजायी , मैंने दरवाज़ा खोला तो उसने पूछा “ कोई लगेज नीचे पहुँचाना है क्या?” ममता जी बाथरूम में थी, मैंने लगेज बाहर निकलवाया और गैलरी में रविन्द्र जी के साथ ममता जी के आने का इंतज़ार करने लगी. इस पर उस स्टाफ ने पूछा “ और कोई सामान है क्या सर”

रविन्द्र कालिया “ एक ख़ास सामान रह गया अन्दर पर तुमको हाथ नहीं लगाने दूंगा भाई, शादी किया है उससे”

हम सभी ज़ोर से हँस दिये, इस बीच कालिया जी का “ख़ास सामान “ भी बाथरूम से बाहर आ गया.

बस ऐसे ही याद आएंगे रविन्द्र कालिया जी………….नमन.

memories

I am discarding

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I am slowly discarding

The notion of love fed to us

When the cupid strikes

And butterflies fly

The letters with sweet sugary words

The one with tall promises

To bring down the stars

The long calls

The slow morning walks

Passion into lust

Desires into madness

And then it all flows away

We call it names

The dirty names

And wonder why no one told us that

And we never asked

What happened to Snowwhite

And her fairy tale dwarfed

What did rapunzel do

When she regretted cutting her locks

When Cindrella wanted to move on

And Aladin turned out into a coward man

The blues and whites

Turn into everyday tides

I am learning to reevaluate
the notions associated with love.
Understanding doesn’t come mostly
Forgiveness isn’t always easy

I am throwing away

The valiance of warriors

And the chivalry of heroes

The love saga of winning over

And the epic romance

No one tells you

Companionship, coupling and Commitment

We have a habit of giving names

When all is left behind is

Comfirt, Curses and Causes

I am slowly discarding
Idea of complicated forbidden romances

Where the everyday talked someday never comes

And you always have a sorry for an answer

Piece by piece

I am discarding

One love notion at a time

Until all that remains

Is true

And how it should be felt.

पुष्कर ,पंडित और PALMISTRY

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चित्र साभार : pinterest.com

अभी हाल में ही पुष्कर की एक आकस्मिक यात्रा पर गयी.पुष्कर का पूरा अस्तित्व ही जिस तरह एक ख़त्म हो चुकी कहानी से जन्म लेता है, यह मुझे बहुत आकर्षित करता है. ब्रह्मा के होने और ना होने के बीच खड़ा है पुष्कर.यह क्या खुद में एक बहुत बड़ी irony नहीं है कि सृष्टि के रचयिता की सृष्टि पुष्कर की झील और चार पहाड़ियों के बीच सिमट कर रह गयी है.

दिसम्बर का महीना जब अरावली की पहाड़ियां कोहरे की शाल ओढ़ लेती हैं, पुष्कर एक अविस्मरणीय दृश्य क्रिएट करता है. एक छोटी सी झील और उसके किनारे लगे करीने से मंदिर, कपड़ों और कम्फर्ट से बेफिक्र फिरंग और ध्यान लगाते साधु, पुष्कर में ब्रह्मा जी के दर्शन मिले ना मिलें, यह तो ज़रूर दिखेंगे.

ऐसे ही एक पंडित जी से मुलाकात हुई, जीजाजी ने बताया कि पंडित जी एक बहुत फेमस ज्योतिषी हैं. हाथ की रेखाओं को पढ़कर जीवन का पूरा लेखा जोखा बता देंगे. यूँ तो मैं नास्तिक होने का दावा करते अक्सर दिख जाउंगी पर भविष्य कैसा होगा, क्या होगा इस मोह माया से कौन कब विरक्त हो पाया है. तो यहाँ सुनिए पंडित जी की भविष्वाणी सिलसिलेवार ढंग से. हस्तरेखा विज्ञान से तो दूर दूर तक पंडित जी का कोई लेना देना नहीं हैं, पर पंडित जी थे बड़े होशियार, घाघ किस्म के, यूँ ही वो अजमेर के प्रतिष्ठित ज्योतिषी नहीं बन गए.

पंडित जी – आईये हिंदी में पढूं या shall I tell you in English?

बेवकूफ बनती ग्राहक – हिंदी में ही बताइये, अंग्रेजी में थोडा कम समझ आता है मुझे.

पंडित जी ने हाथ को पूरे २ मिनट ४० सेकंड देखा, हाथ बंद करवाये, खुलवाये ऊपर करो,नीचे करो

बेवकूफ बनती ग्राहक (मन में ) – पंडित जी तो बहुत ग्यानी लगते हैं

पंडित जी- अच्छा बताऊँ की बुरा ?

बेवकूफ बनती ग्राहक ( बुरा जो देखन मैं चला की मुद्रा में ) – सब बताइये पंडित जी.

पंडित जी- देखिये आप अपने बारे में किसी के भी ओपिनियन को दिल पे लेती हैं, इससे आपका ही नुक्सान होता है, आपका समय खर्च होता है.

बेवकूफ बनती ग्राहक (मन में ) – ये भविष्य वक्ता है कि फिलोसोफेर.

पंडित जी- उम्र लम्बी है आपकी

बेवकूफ बनती ग्राहक (मन में ) – खुश रहती हूँ लम्बी उम्र तो होगी ही.

पंडित जी- स्वास्थ्य की कभी कोई दिक्कत नहीं होगा

पंडित जी – अरे पंडित जी मेरा और बीमारियों का बड़ा पक्का वाला इश्क है, वो जाती नहीं कभी मुझे छोड़ कर.

पंडित जी- विवाह उत्तम होगा, 24 – 26 के बीच हो जायेगा

बेवकूफ बनती ग्राहक- उत्तम तो होगा ही, अच्छी खासी हूँ देखने में ;-)पर मैंने तो 26 की उम्र पार कर ली है .

पंडित जी – ओह! (हाथ को ध्यान से देखते हुए) 34 तक तो अवश्य हो जायेगा.

बेवकूफ बनती ग्राहक- अब 34 तक नहीं होगा पंडित जी तो क्या ही होगा उत्तम विवाह.

पंडित जी- पढाई आपकी मास्टर्स लेवल की होगी.

बेवकूफ बनती ग्राहक- पर मैं तो सिर्फ ग्रेजुएट हूँ

पंडित जी- मतलब आपका ज्ञान, IQ लेवल मास्टर्स के दर्जे का होगा.

बेवकूफ बनती ग्राहक (मन में)- बहुत बढ़िया पंडित जी, आपकी दुकान के चलने का पूरा राज़ यही है.

पंडित जी- देखिये धन बहुत है आपके हाथ में

बेवकूफ बनती ग्राहक- मुझे धन नहीं चाहिये, मुझे यश चाहिए

पंडित जी- धन और यश तो साथ साथ ही होंगे

बेवकूफ बनती ग्राहक- ऐसा नहीं है पंडित जी, धन के बिना भी यश आ सकता है और अच्छा खासा धन तो एक चाट वाला भी कम सकता है.

पंडित जी- नहीं नहीं, धन और यश तो साथ में ही रहता है, आपकी सोच गलत है.

बेवकूफ बनती ग्राहक- career के बारे में कुछ बताइये पंडित जी.

पंडित जी- सरकारी नौकरी लग सकती है अगर मेहनत करें तो.

बेवकूफ बनती ग्राहक( मन में )- मेहनत करूँ तो देश की प्रधान मंत्री भी बन सकती हूँ. अच्छा ये बताइये कि क्रिएटिव क्षेत्र में कोई स्कोप है?

पंडित जी – नहीं नहीं कुछ ख़ास नहीं हॉबी के लिये करना चाहते हो तो कर लो बाकी तो कोई कला जैसा है नहीं हाथ में.

बेवकूफ बनती ग्राहक( मन में ) – इस भविष्यवाणी के विरोध में मैं अपने “बेस्ट ब्लॉगर” अवार्ड को वापस करने की घोषणा करती हूँ.

इसके बाद पंडित जी ने मुझसे कुछ “specific” जाने की इच्छा हो तो पूछने के लिये कहा, अभी तक कि पूरी palmistry इतनी जनरल थी कि अब और बेवकूफ बनने की हिम्मत मुझमे बाकी नहीं थी.

जेब से गांधीजी के बोझ को थोड़ा हल्का किया और मन में यह सोचा कि अब किसी पंडित को हाथ नहीं दिखाना है. विज्ञानं की छात्रा होने के बाद भी इतना अंधविश्वास, धिक्कार है मुझ पर.

पुष्कर से वापस निकल कर दिल्ली के हवाई अड्डे पर पहुंची, कोहरे के कारण फ्लाइट देरी से चल रही थी. अपनी पसंदीदा जगह क्रॉसवर्ड पहुंची, बेस्ट सेलर्स सेक्शन पर नज़रें घूमा ही रही थी कि बेजान दारूवाला की “Know your stars in 2016” पर ठिठक गयी. और किसी अदृश्य शक्ति से “Aquarius या कुंभ” राशि वाले पन्ने पर अपने आप ही चल दी.

बाकी तो आप जानते ही हैं, नास्तिक हूँ और वही विज्ञान की बात.