In memory of Peshawar Attack

I was asked to pen down a memoir for a blogging challenge, i was wondering what to write and suddenly Facebook popped up a memory, memory of 16 December 2014, the day when in Peshawar school children were brutally murdered, a day when we were ashamed to call ourselves human.
So for #Blogchatter weekly challenge on memoirs, i am writing a poem on the #PeshawarAttack.
Never ever forget the small coffins.

606x340_319019

सुबह उठते ही कहा था तुझसे अम्मी
आज स्कूल नहीं जाऊंगा
बहुत ठण्ड है आज , थोड़ी देर और सोऊंगा
अलसाई आँखों को मलते
हाँथ में तुमने टूथब्रश क्यूँ पकडाया था
मुझे स्कूल भेजने के बदले
तूने मेरा फेवरेट टिफ़िन बनाया था
अम्मी ने बालों को फेरते हुए कहा था
इस जन्मदिन तुझे नया बस्ता दिलवायेंगे
और पापा ने डांट कर कहा था
बस छूटी तो हम स्कूल छोड़ने नहीं जायेंगे
अभी कल ही तो माँ ने नया ब्लेज़र बनवाया था
और पापा ने न्यू ईयर पर कराची का प्रोग्राम बनाया था
और आज़ छोटे ताबूतों से निकला मेरा एक मासूम सवाल
कि टीचर ने कभी T for Terrorist तो नहीं पढ़ाया था
माँ मैं अब कभी वापस नहीं आऊंगा
उस सुबह की आखिरी हंसी में रह जाऊंगा
पापा से कहना मेरे स्कूल ना आयें
तू देख नहीं पाएगी उन्हें मेरा ताबूत उठाये…………सहर

We are wordsmiths………We Mint words.Happy to be a part of #Blogbuddy program by @BlogChatter.”

 

 

 

 

 

4 Replies to “In memory of Peshawar Attack”

  1. Such an emotional poem. Hats off to the way you have penned down a small child’s expression and thoughts. My eyes became numb reading and imaging it. Expecting more such reads from you…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *