मेरे बूढ़े मोहल्ले की बूढ़ी माताजी

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मेरे मोहल्ला अब बूढ़ा हो चला है. ये तब की बात है जब भिलाई, मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. औद्योगिक नगर भिलाई बहुत पहले ही समय की दौड़ से कुछ अलग हटकर खड़ा हो गया है. ये आज भी वैसा ही है जैसे नेहरूवियन एरा में हुआ करता था, बिलकुल वैसा- उतना ही छोटा, उतना ही व्यवस्थित और वही मुट्ठी भर लोग.

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पर मेरा मोहल्ला इस “स्टील सिटी”से बाहर था, आज के शब्दों में उसको अगर किसी एक श्रेणी में डालना हो तो “satellite town” और slum के बीच का कुछ.एक बहुत बड़ा वर्ग जो उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार से रोज़गार की खोज में निकला था, उन सब ने इस मोहल्ले को बसाया था. स्टील सिटी से बाहर, स्टील सिटी से बिलकुल अलग – संकुचित, अव्यवस्थित, तंग और सभ्य लोगों की भाषा में कहूँ तो “बिहारी मोहल्ला“.

आज जब हम उस मोहल्ले से टाउनशिप में पहुँच गए हैं तो देखती हूँ कि मेरा मोहल्ला बूढ़ा हो गया है. बुढ़ापे से याद आता है मुझे वो बूढ़ी औरत जो पूरे मोहल्ले की “माताजी” थी, पोटली बाबा से भी बूढी. मैंने उनको बूढ़ा ही देखा था. एक छोटे से कोठरीनुमा घर में रहती थी माताजी. उस कोठरीनुमा घर में उनके साथ थे – उन्ही के जीवन की तरह बेरंग परदे, एक रामचरितमानस, ठाकुर जी की मूर्ती और कुछ टूटे बर्तन.

माताजी जी का पूरा समय ठाकुर जी की पूजा करते और अपने ढोलक पर अनगढ़ से कीर्तन गाते ही बीतता था.वो कहाँ से आई थी, कब माताजी बन गयी इसका पुख्ता जवाब किसी के पास नहीं था. एक बेटा- बहू थे जो उनको बहुत पहले छोड़ चुके थे.

किम्वदंती यह है कि एक बंद पड़ी राइस मिल में जब उन्होंने कीर्तन किया तो वह मिल चल पड़ी, इसका भी कोई ठोस सबूत किसी के पास नहीं, कुछ ठीक सा किसी को याद भी नहीं पर वह पूरे मोहल्ले की माताजी जरुर बन गयी.माँ अक्सर हमें उनके कोठरीनुमा घर में ले जाती थी. माँ की उन पर अटूट श्रद्धा थी और हमारी उनके हाथ के बने पेड़ों पर जो ठाकुर जी के भोग के लिए वह रोज़ बनाती थी. ऐसा नहीं है कि शुद्ध दूध के बने इन पेड़ों का ख़ास ट्रीटमेंट सिर्फ ठाकुर जी के लिये था, गाहे बगाहे कभी उनका बेटा उनसे मिलने आता था तो अपने राजदुलारे के लिये वो ऐसे ऐसे पकवान ख़ुशी से बनाती थी कि ठाकुर जी को भी काम्प्लेक्स हो जाता था.

आज सोचती हूँ तो लगता है वृद्धावस्था में बेटे द्वारा छोड़े जाने पर भक्ति ही उनका सबसे बड़ा संबल थी.अगर वो माताजी नहीं होती तो किसी दूसरे मोहल्ले की भिखारिन होती. रामचरितमानस के दोहों में और कृष्ण- राधा के कीर्तनों में अपने जीवन के एकाकीपन को दूर करती, लोगों से श्रद्धा और स्नेह की दक्षिणा ले कर वो अपना और अपने ठाकुर जी का गुज़ारा कर रही थी.

एक दिन पता चला कि किसी लम्बी बीमारी के बाद माताजी चल बसीं. उन्होंने बीमारी में बिस्तर पकड़ लिया था, आखिरी वक़्त में उनका बेटा जो कुछ किलोमीटर दूर ही रहता था, उन्हें अपने साथ ले गया. फिर वो लौट कर उस कोठरीनुमा घर में वापस नहीं आयी. आखिरी वक़्त की सेवा का हिसाब बेटे ने उस कोठरीनुमा घर को बेचकर पूरा कर लिया.

उनके आखिरी समय में माँ उनसे मिलने गयी तो उन्होंने अपनी प्रिय ढोलक माँ को दे दी.वो ढोलक आज भी हमारे घर पर है, शादी ब्याह के अवसर पर वो ढोलक भी निकाली जाती है और याद दिलाती है माताजी के झुर्रियों से भरे हाथ उस ढोलक पर थाप देते हुये.

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कुछ लोग यूँ ही मर जाते हैं, जैसे बीमार पड़ना और मरना भी एक काम है. क्या यह कम डरावना नहीं है कि उन्हें उस ढोलक के सिवा कोई याद नहीं करता होगा.

ये थी मेरी मिट्टी में पड़ी एक सूखी जड़ की कहानी.

ये थी मेरे बूढ़े मोहल्ले की बूढ़ी माताजी की कहानी.

{नोट: ठाकुर जी का क्या हुआ, कहा गए, किस हाल में हैं – इसका पता किसी को नहीं.}

 

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