पोटली बाबा की

हम यात्रा पर निकले हैं ,गाँव की कच्ची पगडंडियां, खेत की मुंडेर के बराबर दौड़ती मिटटी की सडकें बड़ी होकर कब शहर की चौड़ी सड़क बन गयी यह देखने. हर शहर का एक चेहरा होता है जिस पर नए विचार,नए सामाजिक संगठनों और नयी ज़िन्दगी की परत चढ़ जाती है, आइये चलिए मेरे साथ ढूंढते हैं उस अनपहचाने को जो पीछे छूटता जा रहा है.

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हम चलेंगे कुछ कहानियाँ सुनने, किसी अधूरे प्रेम के गीतों पर अपने पैर थिरकने, किसी नए ज़ायके का लुत्फ़ उठाने और इस यात्रा में हम करेंगे हर देश की शिनाख्त उस देश के नज़रिए से. विकास की रफ़्तार से कुछ रंग गहरे हुए तो कुछ बेरंग भी. वक्त को खूँटी से उतारकर हम ढूंढेंगे उन रंगों को.

रुकिए….रुकिए कहीं आपने यह तो नहीं सोच लिया की यह “Just another travel blog” है. अगर हाँ तो यह जान लीजिये की इस पोटली में अतीत, भविष्य और वर्तमान लादे एक जगह से दूसरे जगह फिरते हम करेंगे उन फसानों का ज़िक्र जिसे समय की दौड़ से चुराकर संस्कृति ने रख छोड़ा है किसी बंद  कपाट में .

 

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