पोटली बाबा की ………Not just another travelougue

14606310_1438459109501728_2828032791745871334_n

हम क्यूँ लिख रहे हैं अपनी यात्राओं के बारे में, ऐसा क्या है हमारे पास कहने को जो किसी ने कहा नहीं, ऐसा क्या है हमारे पास बताने को जो किसी और ने पहले ही नहीं सुना दिया. हम आवारा मुसाफिर हैं ये इसलिए क्यूंकि यात्राएँ हमें रूबरू कराती हैं हमारे बिलकुल रॉ रूप से, बिना किसी ओर- छोर की ख़ुशी, बस यूँ ही बहती ख़ुशी.

निर्मल वर्मा कहते हैं “मरने से पहले हममें से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें । अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएँ… आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुँचेंगे, माँ-बाप, दोस्त, पति… सारे छिलके दूसरे के, आखिर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जाएगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है।“

उस सूखी डंठल की खातिर, जिसे आखिर में मिटटी में दबा दिया जायेगा, हम यात्रा पर निकले हैं ,गाँव की कच्ची पगडंडियां, खेत की मुंडेर के बराबर दौड़ती मिटटी की सडकें बड़ी होकर कब शहर की चौड़ी सड़क बन गयी यह देखने. हर शहर का एक चेहरा होता है जिस पर नए विचार,नए सामाजिक संगठनों और नयी ज़िन्दगी की परत चढ़ जाती है, आइये चलिए हमारे साथ ढूंढते हैं उस अनपहचाने को जो पीछे छूटता जा रहा है.

IMG_20160627_011500

हम चलेंगे कुछ कहानियाँ सुनने, किसी अधूरे प्रेम के गीतों पर अपने पैर थिरकने, किसी नए ज़ायके का लुत्फ़ उठाने और इस यात्रा में हम करेंगे हर गाँव, हर पगडण्डी, हर शहर, हर देश की शिनाख्त उस देश के नज़रिए से. विकास की रफ़्तार से कुछ रंग गहरे हुए तो कुछ बेरंग भी. उन गुम हो गये रंगों की खोज में, एक शहर को जिन्दा बनाते उन लोगों की खोज में जो उस शहर को जिन्दा रखते हैं पर लिखे नहीं जाते. कल के फाटक को खोल कर हम झांकेंगे बीत चुके वक़्त में,

रुकिए….रुकिए कहीं आपने यह तो नहीं सोच लिया की यह “Just another travelougue” है. अगर हाँ तो यह जान लीजिये की इस पोटली में अतीत, भविष्य और वर्तमान लादे एक जगह से दूसरे जगह फिरते हम करेंगे उन फसानों का ज़िक्र जिसे समय की दौड़ से चुराकर संस्कृति ने रख छोड़ा है किसी बंद कपाट में .

IMG-20160927-WA0063.jpg